अधूरी बातें…

रात के समय मोबाइल में पुराने संदेश पढ़ता एक युवक, खिड़की के बाहर देखते हुए बीते रिश्ते को याद करता हुआ।
रात के समय मोबाइल में पुराने संदेश पढ़ता एक युवक, खिड़की के बाहर देखते हुए बीते रिश्ते को याद करता हुआ।

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

राघव को आज भी वह दिन याद है, जब पहली बार उसकी बात रिद्धिमा से हुई थी। उसने एक किताब पर कुछ लिखा था और रिद्धिमा ने उस पर एक लंबा-सा संदेश भेज दिया था। संदेश इतना गहरा था कि राघव को लगा, यह लड़की अलग है।

रिद्धिमा बहुत पढ़ी-लिखी थी। गाँव में पली-बढ़ी थी, लेकिन उसके सपने किसी बड़े शहर की ऊँची इमारतों जैसे थे। वह हमेशा कुछ नया सीखना चाहती थी। किताबें उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं। घर के काम खत्म होने के बाद वह घंटों पढ़ती रहती। कभी इतिहास, कभी साहित्य, कभी मनोविज्ञान।

लेकिन ज़िंदगी हमेशा सपनों के हिसाब से नहीं चलती।

एक दिन अचानक उसका विवाह एक ऐसे परिवार में कर दिया गया, जहाँ औरतों की दुनिया घर की चारदीवारी से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती थी। पर्दा था, ढेर सारी बंदिशें थीं और एक अनकही उम्मीद थी कि अब उसकी पहचान सिर्फ किसी की बहू, पत्नी और माँ बनकर रह जाए।

वह सब करती थी। घर संभालती, बच्चों का ख्याल रखती, सबकी पसंद-नापसंद याद रखती। लेकिन रात को जब सब सो जाते, तब वह चुपचाप किताब खोलकर बैठ जाती, क्योंकि उसके भीतर एक लड़की अब भी ज़िंदा थी। वह लड़की, जिसके कुछ सपने अधूरे रह गए थे।

शायद यही अधूरापन उसे राघव तक ले आया।

दोनों की बातें शुरू हुईं।

पहले किताबों पर।

फिर कविताओं पर।

फिर ज़िंदगी पर।

और फिर उन बातों पर, जो हम किसी से आसानी से नहीं कहते।

राघव को अच्छा लगता था कि कोई उसे इतनी गहराई से समझता है। और रिद्धिमा को यह सुकून था कि कोई है, जो उसके सपनों को पागलपन नहीं समझता।

धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती उनकी रोज़मर्रा की आदत बन गई।

सुबह की चाय के साथ एक संदेश।

दोपहर में दो मिनट की बात।

रात को घंटों की बातचीत।

कई बार तो रात के दो बज जाते और दोनों को पता ही नहीं चलता।

रिद्धिमा कहती, “अगर मैं अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जी पाती न, तो बहुत कुछ करती।”

राघव हँसकर कहता, “अभी भी देर नहीं हुई है।”

और वह चुप हो जाती।

उस चुप्पी में जाने कितने सालों की घुटन होती थी।

धीरे-धीरे उसने घर की चौखट के बाहर कदम रखना शुरू किया। छोटे-छोटे कार्यक्रमों में जाना, लोगों से मिलना, मंच पर बोलना….उसके भीतर का आत्मविश्वास लौटने लगा था।

राघव उसे देखकर खुश होता था।

बहुत खुश।

उसे लगता था, जैसे किसी पिंजरे का दरवाज़ा खुल गया हो और चिड़िया ने पहली बार आसमान देखा हो।

फिर एक दिन रिद्धिमा ने कहा, “मैं अब सार्वजनिक जीवन में जाना चाहती हूँ। लोगों के लिए काम करना चाहती हूँ।”

राघव ने बिना सोचे कहा, “जाओ। तुम्हें कोई नहीं रोक सकता।”

वह सचमुच आगे बढ़ने लगी।

नए लोग मिले।

नई जगहें मिलीं।

नई पहचान मिली।

फोन की घंटियाँ बढ़ गईं।

संदेशों की संख्या बढ़ गई।

लेकिन एक जगह कुछ कम होने लगा।

उनकी बातें।

पहले उसने देर से जवाब देना शुरू किया।

फिर कभी-कभी संदेश अनपढ़े रह जाते।

फिर कई दिनों तक कोई बात नहीं होती।

राघव समझता था। वह जानता था कि वह अपने सपनों की तरफ बढ़ रही है। लेकिन समझ लेने से दिल का खालीपन कम नहीं होता।

एक रात उसने उसका पुराना संदेश पढ़ा-

“हमेशा साथ रहेंगे, चाहे जो हो जाए।”

वह बहुत देर तक उस संदेश को देखता रहा।

फिर मोबाइल बंद कर दिया।

कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं, बस धीरे-धीरे उनकी आवाज़ें बंद हो जाती हैं।

एक दिन ऐसा आया, जब दोनों के बीच न कोई संदेश बचा, न कोई शिकायत, न कोई सवाल।

सिर्फ खामोशी।

बहुत लंबी खामोशी।

कभी-कभी राघव उसकी तस्वीरें देखता, जहाँ वह मंच पर लोगों के बीच मुस्कुरा रही होती। उसे खुशी भी होती और थोड़ा दर्द भी।

खुशी इसलिए कि वह वहाँ पहुँच गई थी, जहाँ पहुँचना चाहती थी।

दर्द इसलिए कि उस सफर में कहीं पीछे वह छूट गया था।

लेकिन उसने उससे कभी नाराज़ होना नहीं सीखा।

क्योंकि वह जानता था, कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में साथ चलने नहीं, हमें बदलने आते हैं।

रिद्धिमा ने उसे इंतज़ार करना सिखाया।

खामोशी पढ़ना सिखाया।

और यह भी सिखाया कि हर प्रेम का अंत मिलन नहीं होता।

कुछ प्रेम ऐसे भी होते हैं, जो किसी पुराने संदेश, किसी अधूरी बात और किसी याद की तरह हमारे भीतर हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

शायद उनकी कहानी भी ऐसी ही थी—

एक लड़की, जो अपने सपनों की तलाश में निकल पड़ी।

और एक लड़का, जिसने उसे उड़ना सिखाया, फिर चुपचाप आसमान की ओर देखता रह गया।

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