
प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तर प्रदेश)
ये स्त्रियाँ भी न…
कभी स्वयं से मिल नहीं पातीं।
हर सदस्य की गतिविधि इन्हें मालूम होती है,
पर अपने जीवन को कभी गढ़ नहीं पातीं।
जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते
इतना खो जाती हैं कि
अगले दिन की दिनचर्या को
सोचते-सोचते सो जाती हैं।
पति के ऑफिस का क्या सामान रखना है,
ये तो याद रहता है,
पर खुद के लिए क्या कम है,
इसकी कभी खबर नहीं होती।
बच्चों का होमवर्क कराने में
अच्छी मार्गदर्शिका तो होती हैं,
पर अपनी राहों को कभी
प्रशस्त कर ही नहीं पातीं।
आईने में सजना-संवरना
तो बहुत अच्छा लगता है,
पर अपने अक्स की अंतरात्मा तक
पहुँच ही नहीं पातीं।
बारिश की बूंदों संग भीग तो जाती हैं,
पर मन की तपिश को मिटा ही नहीं पातीं।
और तो और,
कभी तारीफों का गुलदस्ता मिल भी जाए,
तो उसका श्रेय भी
परिवार के सानिध्य को ही बताती हैं।
तभी तो ये स्त्रियाँ
स्वयं से कभी मिल ही नहीं पातीं।

बढ़िया
Thank u moshmi ji🙏🏻🌹