पराया मायका

मायके के दरवाज़े पर खड़ी एक भावुक बेटी, माँ की तस्वीर को देखते हुए बीते दिनों को याद करती हुई।

नमिता सिन्हा, बेंगलुरु

“मेरी बेटी आएगी, उसे यह पसंद है, उसे वह पसंद है…” माँ की इन्हीं यादों के साथ बरसों बाद रीमा अपने मायके जा रही थी। ट्रेन की खिड़की से बाहर भागते खेतों को देखते हुए उसे याद आ रहा था कि कैसे माँ हर बार उसके आने से कई दिन पहले ही तैयारियाँ शुरू कर देती थीं।

स्टेशन पर उतरते ही रीमा की आँखें भीड़ में किसी परिचित चेहरे को खोजने लगीं। फिर अचानक उसे याद आया—अब माँ नहीं हैं। अब कोई हाथ हिलाते हुए दूर से नहीं पुकारेगा—

“रीमा… इधर आ!”

भाई लेने आया था। रास्ते भर उसने ऑफिस, ट्रैफिक और बच्चों की पढ़ाई की बातें कीं, लेकिन रीमा खामोश रही। उसकी नज़रें उन रास्तों पर टिकी थीं, जहाँ कभी माँ उसके साथ बाज़ार जाया करती थीं।

घर सामने आया तो उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। वही पुराना दरवाज़ा, वही आँगन, वही तुलसी का चौरा… मगर फिर भी सब कुछ बदल गया था।

पहले, जैसे ही वह घर में कदम रखती, माँ दौड़कर उसे गले लगा लेती थीं।

“इतनी दुबली क्यों हो गई? ठीक से खाती नहीं क्या?”

और फिर बिना रुके सवालों की झड़ी लग जाती।

आज दरवाज़ा भाभी ने खोला। उन्होंने मुस्कुराकर स्वागत किया, पानी दिया, हालचाल पूछा। सब ठीक था, फिर भी कुछ अधूरा था।

रीमा धीरे-धीरे घर के हर कोने को देखने लगी। दीवारों पर नया पेंट हो गया था। पुराने पर्दे बदल गए थे। माँ का लकड़ी वाला मंदिर अब दूसरे कोने में रखा था।

लेकिन सबसे ज़्यादा खालीपन रसोई में महसूस हुआ। यहीं माँ घंटों खड़ी होकर उसके पसंदीदा पकवान बनाया करती थीं।

रीमा को याद आया, शादी के बाद जब वह पहली बार मायके आई थी, तब माँ सुबह चार बजे उठ गई थीं। उसकी पसंद की कचौड़ियाँ, खीर और चटनी बनाई थीं।

और जब रीमा ने हँसकर कहा था—

“माँ, इतना कौन बनाता है?”

तो माँ ने मुस्कुराकर जवाब दिया था—

“बेटियाँ रोज-रोज मायके थोड़ी आती हैं।”

उस याद ने रीमा की आँखें भिगो दीं।

शाम को वह माँ के कमरे में गई। कमरा अब स्टोर जैसा बन गया था। एक कोने में माँ की तस्वीर रखी थी, जिस पर सूखी हुई माला टँगी थी।

रीमा तस्वीर के सामने बैठ गई। उसने धीरे से तस्वीर को छुआ और बोली—

“माँ, मैं आ गई…”

बस इतना कहते ही उसके आँसू बह निकले। उसे लगा, जैसे माँ अभी उसके सिर पर हाथ फेर देंगी।

रात के खाने पर सब साथ बैठे। भतीजे मोबाइल में व्यस्त थे, भाई टीवी देख रहा था और भाभी रसोई संभाल रही थीं। घर में लोग तो पहले से ज़्यादा थे, मगर अपनापन कहीं खो गया था।

उसे याद आया, माँ खाने की थाली लेकर उसके पीछे-पीछे घूमती थीं।

“थोड़ा और खा ले।”

“यह मिठाई भी चख।”

“तेरा चेहरा उतरा क्यों है?”

माँ सिर्फ खाना नहीं परोसती थीं, वे अपना स्नेह परोसती थीं।

तब उसे पहली बार समझ आया कि मायका सिर्फ ईंटों और दीवारों से नहीं बनता। मायका माँ की आवाज़ से बनता है… उसकी प्रतीक्षा से बनता है… उसकी ममता से बनता है।

सुबह जब रीमा वापस जाने लगी तो भाभी ने औपचारिकता में कहा—

“दीदी, अब जल्दी-जल्दी आया कीजिए।”

रीमा ने घर की ओर एक लंबी नज़र डाली। उसकी आँखें माँ को खोज रही थीं। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली—

“हाँ… आऊँगी।”

लेकिन वह जानती थी, माँ के जाने के बाद मायका भी कहीं पीछे छूट गया है। अब वहाँ सिर्फ घर बचा है, माँ वाला अपनापन नहीं।

सच ही तो है

माँ के रहते बेटी चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, मायके में हमेशा बच्ची रहती है।

और माँ के जाने के बाद…

वही मायका पराया-सा लगने लगता है।

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