
नीलम पेड़ीवाल, जमशेदपुर, झारखंड
माता-पिता अनमोल हमारे,
हमें जगत में लाते हैं।
निस्वार्थ प्रेम सदा बरसाकर,
जीवन-पथ दिखलाते हैं।
मार्गदर्शक हैं वे हमारे,
नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं।
त्याग स्वयं की सुख-सुविधाएँ,
जीने का ढंग सिखाते हैं।।
जब-जब हम संकट में पड़ते,
ढाल बनकर आगे आते हैं।
उज्ज्वल भविष्य हेतु सदा,
हर समाधान दे जाते हैं।।
आज सभी रिश्ते सिमट गए,
आगे बढ़ने की होड़ में।
माता-पिता भी बोझ बने हैं,
आधुनिकता की अंधी दौड़ में।।
बेटे मग्न अपनी दुनिया में,
मोबाइल में उलझे नाते।
बहू व्यस्त अपने कार्यों में,
कहाँ गए श्रद्धा के खाते।।
सूनी आँखें राह निहारें,
कब कोई अपना आएगा?
जिस आँगन में हँसी खिली थी,
वह आँगन फिर कब मुस्काएगा?
वृद्धाश्रम की चौखट पर,
कितने सपने रोते हैं।
जीते-जी जो अपनों से बिछड़े,
वे हर पल पीड़ा ढोते हैं।।
मत करो उपेक्षा उनकी,
विनती सबसे हमारी है।
हम भी चलेंगे इस पथ पर,
इनमें ही दुनिया सारी है।।
घर के वृद्ध गौरव हमारे,
नेह-निकेतन हम सजाएँ।
अकेला कभी न रहने दें उनको,
हृदय में सदा उन्हें बसाएँ।।
माँ-बाप से बढ़कर जग में,
कोई तीर्थ महान नहीं।
जो उनका आदर करना जाने,
उससे बढ़कर इंसान नहीं।।
बूढ़े हाथों की रेखाओं में,
हमारे कल का मान छिपा है।
उनके आशीषों की छाया में,
जीवन का सम्मान छिपा है।।
आओ, मिलकर प्रण यह लें,
न वृद्धाश्रम की नौबत आए।
हर माता-पिता के चेहरे पर,
फिर से खुशियों की ज्योति छाए।।
माता-पिता हैं जीवन-धन,
इनसे ही संसार सुहाना।
इनकी सेवा ही सच्ची पूजा,
इनसे बढ़कर नहीं खज़ाना।।
