दुनिया की दुनियादारी

भीड़भाड़ वाली सड़क पर शाम के समय अकेला चलता एक भारतीय व्यक्ति, जिसके चेहरे पर गहरी सोच और तन्हाई झलक रही है। उसके आसपास लोग अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं, जबकि वह सच और इंसानियत के रास्ते पर अकेला खड़ा दिखाई देता है।

कंचन माला ’अमर’ (उर्मी)

दुनिया की दुनियादारी में,
यूँ ही उलझा रहता हूँ।

झूठे लोगों की दुनिया में,
रहना ही पड़ता रहता हूँ।

ख्वाहिश की गठरी को यूँ,
हर जगह उठाए फिरता हूँ।

इंसानों की बस्ती में,
तन्हाई है और तन्हा हूँ।

तकदीर दिखाती रंग हजारों,
उसके हाथ का खिलौना हूँ।

सच और झूठ के मेले में,
मैं सच का सच्चा शैदा हूँ।

बेघर हैं जो लोग हमारे,
उनके लिए घरौंदा हूँ।

जिनको लूट मचानी है,
मैं उनकी आँख में चुभता हूँ।

रब की लिखी इबारत को ही,
आँखों में बसाता हूँ।

जिनका नहीं है कोई जग में,
उनके लिए सहारा हूँ।

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