
कंचन माला ’अमर’ (उर्मी)
दुनिया की दुनियादारी में,
यूँ ही उलझा रहता हूँ।
झूठे लोगों की दुनिया में,
रहना ही पड़ता रहता हूँ।
ख्वाहिश की गठरी को यूँ,
हर जगह उठाए फिरता हूँ।
इंसानों की बस्ती में,
तन्हाई है और तन्हा हूँ।
तकदीर दिखाती रंग हजारों,
उसके हाथ का खिलौना हूँ।
सच और झूठ के मेले में,
मैं सच का सच्चा शैदा हूँ।
बेघर हैं जो लोग हमारे,
उनके लिए घरौंदा हूँ।
जिनको लूट मचानी है,
मैं उनकी आँख में चुभता हूँ।
रब की लिखी इबारत को ही,
आँखों में बसाता हूँ।
जिनका नहीं है कोई जग में,
उनके लिए सहारा हूँ।
