छत वाला प्रेम

1994 के एक भारतीय मोहल्ले की छत पर खड़ी एक किशोर लड़की हाथ में छोटी-सी चिट्ठी लिए शर्माते हुए सामने की छत पर खड़े एक लड़के की ओर देख रही है। दोनों छतों पर सूखते कपड़े, पानी की टंकी और दूरदर्शन के पुराने एंटीना दिखाई दे रहे हैं। ढलते सूरज की सुनहरी रोशनी पूरे दृश्य को मासूम पहली मोहब्बत और पुरानी यादों के भाव से भर रही है।

मौसमी चंद्रा, पटना

सन् 1994 की बात है।

उस समय प्रेम ज़रा गरीब हुआ करता था। न फोन, न चैटिंग, न वीडियो कॉल! स्कूलों में भी प्रेम पर कड़ी निगरानी रहती थी।

प्रेम तब या तो चौक-चौराहों पर शुरू होता था या घरों की छतों पर। धूप में सूखते कपड़ों के बीच, पानी की टंकियों की ओट से और शाम के धुँधलके में चुपचाप टहलते कदमों के साथ तिरछी नज़र से बगल की छत ताकना!

सोनरूपा सोलह बरस की थी। बहुत गोरी नहीं थी, मगर उसके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी कि मोहल्ले की औरतें उसे देखते ही कहतीं, “एकदम नाम के अनुरूप! सोने-सी दमकती है लड़की!”

हर शाम वह अपनी माँ के साथ छत पर पापड़ उलटने, अचार की बरनियाँ देखने या कपड़े समेटने जाती।

उसी समय जाने कहाँ से सामने वाले मकान की छत पर एक लड़का भी आ जाता था।

नाम था आदित्य!

शुरू में दोनों ने एक-दूसरे पर ध्यान नहीं दिया। फिर एक दिन अचानक सोनरूपा की नज़र उठी और आदित्य की नज़र उससे टकरा गई।

बस, एक पल में शुरू हो गया लव-शव! वो कहते हैं न—
Love at first sight…
हाँ, वही!

अगले दिन दोनों फिर उसी समय छत पर थे।

फिर अगले दिन।

फिर उसके अगले दिन।

धीरे-धीरे दोनों को समझ आ गया कि अब छत पर आने का कारण कपड़े या पापड़ नहीं रहे, अब कुछ और ही रौनक छा गई थी। सावन उतरने लगा था… तो कभी इंद्रधनुष चमकने लगे थे… मन में!

सोनरूपा जब बाल सुखाने आती, तो जानती थी कि सामने वाली छत से कोई उसे देख रहा है।

और आदित्य शाम होने का इंतज़ार वैसे ही करता था, जैसे किसान पहली बारिश का।

उन दिनों मोहल्ले की छतें भी अजीब थीं। किसी घर में रेडियो बजता रहता, कहीं दूरदर्शन का एंटीना टेढ़ा खड़ा रहता, कहीं बच्चे पतंग उड़ाते। पूरी दुनिया अपनी-अपनी छत पर मस्त रहती और उन सबके बीच दो जोड़ी आँखें अपना अलग संसार बना रही थीं।

एक दिन आदित्य ने हिम्मत करके एक कागज़ पर लिखा—

“तुम्हारा नाम क्या है?”

कागज़ को पत्थर में बाँधा और मौका देखकर अपनी छत से उसकी छत की ओर उछाल दिया। पत्थर जाकर सोनरूपा के पास गिरा!

उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने काँपते हाथों से पर्ची खोली। पढ़कर प्यारी-सी मुस्कान उसके चेहरे पर खिल गई।

फिर क्या था, अगले दिन उसने जवाब लिखा—

“सोनरूपा।”

उस दिन आदित्य को लगा, जैसे उसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो। वह देर तक मुस्कुराता रहा।

अब चिट्ठियों का सिलसिला शुरू हो गया। छोटी-छोटी बातें।

“आज तुम उदास क्यों थीं?”

“गणित में कम नंबर आए हैं।”

“मुझे तुम हँसती हुई अच्छी लगती हो।”

कभी-कभी शब्द खत्म हो जाते। दोनों देर तक चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहते… शाम कब छूट जाती और अँधेरा दस्तक देने लगता, पता ही नहीं चलता।

सोनरूपा ने कभी उसका हाथ नहीं पकड़ा था, आदित्य ने कभी उसका चेहरा पास से नहीं देखा था, फिर भी दोनों एक-दूसरे को शायद उन लोगों से ज़्यादा जानते थे, जो रोज़ मिलते हैं। प्रेम के लिए पास रहने की शर्त थोड़े न होती है, वह तो मीलों दूर खड़े प्रियतम की साँसों को भी सुन सकता है।

फरवरी की एक शाम आदित्य ने रेडियो पर अपने पसंदीदा गीत की गुज़ारिश की।

गुज़ारिश कबूल हुई और गाना बजने लगा—

“पहला नशा, पहला ख़ुमार…”

सोनरूपा को इस बारे में पता था। दोनों ने साथ में वह गीत सुना। सोनरूपा ने लाज से सिर झुका लिया था। उसके पेट में तितलियाँ उड़ने लगी थीं!

उस समय उसे लगा कि दुनिया का सबसे सुंदर गीत शायद उसी के लिए बना है।

लेकिन प्रेम की राहें कभी सीधी कहाँ होती हैं।

एक दिन आदित्य के पिता का तबादला दूसरे शहर हो गया।

खबर सुनकर आदित्य घंटों छत पर खड़ा रहा।

वह रात बहुत भारी थी। सोनरूपा पहली बार पूरी रात रोई थी।

विदा होने से एक दिन पहले आदित्य ने आख़िरी पर्ची फेंकी। उसमें लिखा था—

“अगर किस्मत में हुआ तो हम फिर मिलेंगे। अगर नहीं मिले, तो भी मेरी सबसे सुंदर याद तुम ही रहोगी। तुम्हें देखते हुए मैंने जीवन की सबसे सुंदर शामें बिताई हैं।”

जवाब में सोनरूपा की आँखों से आँसुओं की एक सीधी धार बह चली।

अगले दिन ट्रक आया और… आदित्य चला गया।

सामने वाली छत खाली हो गई।

साल बीतते गए।

छत वही रही, पानी की टंकी वही रही, शाम की हवा भी वही रही, बस उस छत पर अब कोई इंतज़ार नहीं करता था।

कई वर्षों बाद, जब सोनरूपा अपनी बेटी के साथ उसी घर की छत पर खड़ी थी, उसने सामने वाली छत की ओर देखा। वहाँ थोड़ी हलचल थी।

अब वहाँ कोई और परिवार आकर रहने लगा था।

बेटी ने पूछा—

“माँ, क्या देख रही हो?”

सोनरूपा मुस्कुरा दी।

“कुछ नहीं बेटा… बस अपना बचपन।”

हवा धीरे से उसके चेहरे को छूकर गुज़री और उसे लगा, जैसे कहीं दूर कोई लड़का फिर से गुनगुना रहा हो—

“पहला नशा, पहला ख़ुमार…”

कुछ प्रेम कहानियाँ मिलन तक नहीं पहुँचतीं। मुझे लगता है, प्रेम कहानियों को मिलन तक पहुँचना भी नहीं चाहिए। शायद तभी उनकी याद हमारे ज़ेहन में इतनी तरोताज़ा रह पाती है।

अधूरे प्रेम का अपना सौभाग्य होता है। वह समय के साथ बूढ़ा नहीं पड़ता, बल्कि बरसों बाद भी स्मृतियों की छत पर ठहरा रहता है जाड़े की गुनगुनी धूप बनकर।

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