छत वाला प्रेम
सन् 1994 का वह दौर, जब प्रेम के पास न मोबाइल था, न सोशल मीडिया। बस शाम की छतें, तिरछी निगाहें, पत्थर में बंधी चिट्ठियाँ और एक अधूरी मोहब्बत, जो बरसों बाद भी यादों की छत पर जाड़े की धूप बनकर ठहरी रहती है।

सन् 1994 का वह दौर, जब प्रेम के पास न मोबाइल था, न सोशल मीडिया। बस शाम की छतें, तिरछी निगाहें, पत्थर में बंधी चिट्ठियाँ और एक अधूरी मोहब्बत, जो बरसों बाद भी यादों की छत पर जाड़े की धूप बनकर ठहरी रहती है।