भीड़भाड़ वाली सड़क पर शाम के समय अकेला चलता एक भारतीय व्यक्ति, जिसके चेहरे पर गहरी सोच और तन्हाई झलक रही है। उसके आसपास लोग अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं, जबकि वह सच और इंसानियत के रास्ते पर अकेला खड़ा दिखाई देता है।

दुनिया की दुनियादारी

यह कविता उस इंसान की आवाज़ है जो झूठ और स्वार्थ से भरी दुनिया में भी सच, संवेदना और इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश करता है। तन्हाई, संघर्ष और उम्मीद के बीच जीवन का सच्चा चेहरा दिखाती एक मार्मिक रचना।

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