
नीमा शाह, अहमदाबाद
खामोशी की भी एक ज़ुबान होती है,
जो निःशब्द होकर ही बयां होती है।
कह जाती है यूँ तो हज़ारों कहानियां,
दिल में छुपी अनकही मनमानियां।
अल्हड़-सी वो जवानियां,
बचपन की मासूम नादानियां।
जीवन की उलझी परेशानियां,
मुश्किलों में घिरी हैरानियां।
बुढ़ापे की उम्मीद भरी मुस्कानों में,
तन्हा, बेचैन मन की उथल-पुथल लहरों में,
बहती रहती हैं यादों की रवानीयां।
हर एहसास की कहाँ कोई शब्दों वाली जुबां होती है,
खामोशी की भी अपनी एक ज़ुबान होती है।
ये खामोशियां भी कहीं खामोश न हो जाएं,
इसलिए मेरे मन में
नित नई कविताएं जवान होती हैं।।

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