
डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई
हनुमान, तुम मात-पिता बन जाओ,
बच्चों को धीर बंधाओ,
हम घर-बार छोड़कर आए हैं,
हमें दुखों से पार लगाओ।
माँ अंजनी के प्यारे, राम-नाम मतवारे,
राम-नाम में मस्त रहो, भक्तों के रखवाले,
बल-बुद्धि की खान, लीला तेरी महान,
सुख-दुख की इस संसार-नदी में जीवन सारा।
दुनिया में बली न तेरे जैसा,
राम ने भी कहा भरत जैसा,
हर पल महिमा लिखता संसार तुम्हारा,
नित्य सुबह-शाम दर्शन पाएं ऐसा।
तुम हो दया के सागर,
तुम्हारी महिमा अपरंपार है,
झूठ-कपट सब तुम्हारे अधीन,
तुम्हारी कृपा से सबका बेड़ा पार है।
लेखिका के बारे में-
डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।
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