
दीप्ति अग्रवाल ‘दीप’
महाबली हनुमंत के जन्म दिवस की धूम,
भक्त बधाई बाँटते, रहे खुशी से झूम।।
मेरे बाबा, आपकी महिमा अपरंपार,
कैसे वर्णित कर सकूँ, जाती है मति हार।।
शंकर के अवतार हैं, बजरंगी गुणधाम,
महावीर हनुमान नित जपते जय श्री राम।।
बुद्धि-विनय के देवता, सरल सहज व्यवहार,
अतुलित बलशाली, करें पल में बेड़ा पार।।
राम काज से प्रेम है, प्रभु चरणों में स्थान,
जग सारा पूजे तुम्हें, परम भक्त हनुमान।।
लेखिका के बारे में –
दीप्ति अग्रवाल ‘दीप’
समकालीन हिंदी साहित्य की एक सशक्त और संवेदनशील रचनाकार हैं। दिल्ली निवासी दीप्ति ‘दीप’ एक गृहणी होते हुए भी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी हैं।दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज से बी.कॉम की शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने ज्ञान और संवेदना का सुंदर संगम रचा है।
बचपन से ही साहित्य के प्रति गहरी रुचि ने उन्हें पढ़ने से लिखने की ओर प्रेरित किया। पिछले 8 वर्षों से वे निरंतर लेखन के क्षेत्र में सक्रिय रहकर अपनी लेखनी से पाठकों को प्रभावित कर रही हैं। स्वाध्याय के माध्यम से उन्होंने ग़ज़ल और विभिन्न छंदों की बारीकियों को सीखा और उन्हें अपनी रचनाओं में निखारा।उनकी रचनाओं में भावनाओं की गहराई, सादगी और जीवन के यथार्थ का सुंदर प्रतिबिंब देखने को मिलता है।‘महकते अल्फ़ाज़’ और ‘जब दीप जले’ जैसे एकल संग्रह उनकी सृजनशीलता के प्रमाण हैं। साझा संकलनों में भी उनकी सशक्त उपस्थिति साहित्य प्रेमियों के बीच सराही गई है।
दीप्ति ‘दीप’ अपनी लेखनी से निरंतर साहित्य को समृद्ध करती हुई प्रेरणा का दीप प्रज्वलित कर रही हैं।

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