
सुरेश परिहार, पुणे
कल नई दिल्ली सहित पूरे देश में विद्यार्थियों द्वारा धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर प्रदर्शन किया. पुणे में भी शनिवारवाड़ा से कलेक्टर कार्यालय तक पैदल मार्च निकला. इस खबर को न्यूज पेपर में प्रजेंट करते समय जब फोटो का चयन करना शुरु किया तो हजारों की संख्या में विद्यार्थी इसमें शामिल नजर आए. जिनके हाथों में पोस्टर और प्लेबोर्ड थे. जिन पर लिखे शब्दों से उनका आक्रोश साफ झलक रहा था. ये वही युवा विद्यार्थी थे, जिन्हें जेनजी कहा जाता है. जेनजी की भाषा ने एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह केवल बदतमीज़ी है, या एक ऐसी पीढ़ी की बेचैनी, जिसे सुनने के बजाय अक्सर जज किया जाता है? हाल के वर्षों में जब भी किसी छात्र आंदोलन की तस्वीरें सामने आती हैं, एक बात सबसे पहले चर्चा में आ जाती है. पोस्टरों पर लिखी भाषा. कहीं गालियाँ, कहीं तीखे तंज, कहीं व्यवस्था के प्रति खुला आक्रोश. सबसे अधिक हैरानी तब होती है, जब इन्हीं पोस्टरों को थामे लड़कियाँ भी उतनी ही मुखर दिखाई देती हैं. तुरंत एक सवाल उठता है. क्या यह वही पीढ़ी है, जिसे हमने संस्कार दिए थे? लेकिन शायद इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने इस भाषा के पीछे छिपे आक्रोश को समझने की कोशिश की है?

जेनजी यानी वह पीढ़ी, जिसका जन्म लगभग 1997 से 2012 के बीच हुआ. यह वह पीढ़ी है जिसने बचपन से इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपनी दुनिया का हिस्सा पाया. इसके लिए सूचना किसी पुस्तकालय की अलमारी में बंद नहीं, बल्कि हथेली पर मौजूद है. यही कारण है कि यह पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक सवाल पूछती है, जवाब मांगती है और किसी भी विषय पर तुरंत प्रतिक्रिया देती है.
यहां एक बात और स्पष्ट करना चाहूंगा कि हर पीढ़ी के पास अपने संघर्ष रहे हैं. हमारे जमाने में स्कूल-कॉलेज की फीस, कपड़े, जेब खर्च के साथ और कई सारी बातों के लिए संघर्ष था. जिसे हम चुपचाप सहन करते रहे लेकिन अब फर्क केवल इतना है कि पहले की पीढ़ियाँ अपने गुस्से को भीतर दबा लेती थीं, जबकि जेनजी उसे सार्वजनिक कर देती है.
आज का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव, रोजगार की अनिश्चितता, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सामाजिक तुलना, मानसिक तनाव और भविष्य की असुरक्षा के बीच जी रहा है. यदि उसे लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो वह चुप रहने के बजाय सड़क पर उतरकर अपनी बात कहता है. इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी हर अभिव्यक्ति सही है, लेकिन उसका आक्रोश केवल एक दिन में पैदा नहीं हुआ. वह वर्षों के दबाव, असुरक्षा और निराशा की उपज भी हो सकता है.

अब बात करें उनकी भाषा की तो यह भी एक प्रश्न है कि उनकी भाषा इतनी आक्रामक क्यों हो गई?यह प्रश्न सबसे अधिक परेशान करता है.क्या फिल्मों और वेब सीरीज़ ने यह भाषा दी?
उत्तर है- हाँ, लेकिन पूरी तरह नहीं.भाषा केवल फिल्मों से नहीं बनती.
परिवार, मित्र, सोशल मीडिया, राजनीतिक माहौल, इंटरनेट संस्कृति, मीम्स, गेमिंग और मनोरंजनसभी मिलकर भाषा को प्रभावित करते हैं.
पिछले कुछ वर्षों में वेब सीरीज़ और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर गालियों को रियलिस्टिक संवाद कहकर सामान्य बनाया गया. धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि बिना अपशब्दों के संवाद प्रभावशाली नहीं बन सकते.
दूसरी ओर, निर्माता भी वही दिखाने लगे जो उन्हें लगा कि दर्शक पसंद कर रहे हैं. यानी समाज और मनोरंजन उद्योग के बीच एक दो-तरफा प्रभाव लगातार काम कर रहा है. समाज फिल्मों को प्रभावित करता है और फिल्में समाज की भाषा को.
अब लड़कियाँ भी उसी भाषा में क्यों बोल रही हैं? यह सामाजिक परिवर्तन का एक नया पक्ष है. एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में कठोर या अपशब्दों वाली भाषा केवल पुरुषों से जोड़ी जाती थी. अब कई युवतियाँ भी उसी भाषा का प्रयोग करती दिखाई देती हैं.
फिर सवाल यह है कि क्या यह समानता है?
या अभिव्यक्ति का नया रूप? या फिर सोशल मीडिया संस्कृति का प्रभाव?
इन प्रश्नों पर अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन इतना स्पष्ट है कि भाषा का यह परिवर्तन केवल महिलाओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी युवा संस्कृति में दिखाई दे रहा है, लेकिन क्या गुस्से को गाली की ज़रूरत है.
यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है. लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है. अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना भी आवश्यक है. लेकिन क्या गाली किसी आंदोलन को मजबूत बनाती है? इतिहास गवाह है कि सबसे प्रभावशाली आंदोलनों की पहचान केवल उनके आक्रोश से नहीं, बल्कि उनके नैतिक बल से हुई है.जब आंदोलन की चर्चा मुद्दों के बजाय पोस्टरों की भाषा पर होने लगे, तब मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है.
तीखी भाषा कुछ समय के लिए ध्यान तो खींच सकती है, लेकिन वह हमेशा सम्मान नहीं दिलाती. लेकिन मेरी राय में जेनजी से भी कई बातें सीखी जा सकती है. मसलन चुप रहना हमेशा समाधान नहीं होता.यह पीढ़ी सवाल पूछती है.जवाब मांगती है.पारदर्शिता चाहती है.अन्याय के सामने खड़ी होती है.ये गुण किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक हैं.लेकिन उसी के साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि संवाद की गरिमा बनी रहे.यदि उनका आक्रोश विवेक से जुड़ जाए, यदि उनकी निर्भीकता मर्यादा से जुड़ जाए और यदि उनका विरोध संवाद में बदल जाए, तो यही पीढ़ी आने वाले भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. आख़िर इतिहास यह नहीं याद रखता कि किसने सबसे ऊँची आवाज़ में विरोध किया था, बल्कि यह याद रखता है कि किसने अपनी आवाज़ से समाज को बदल दिया.

Amazing Sir
सी जे पी के आंदोलन से युवा जागृत हुआ है!
अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष करणे के लिये वह तयार हो रहा है l
आपने विषय की गंभीरता को समजते हुए, विशेष कव्हरेज देकर टिपणी भी की है l आपका यह कदम उल्लेखनीय है l
हार्दिक शुभकामनाये l
यह लेख बहुत अच्छा लगा। आज के बच्चों और युवाओं को अक्सर उनकी भाषा और व्यवहार के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है, लेकिन उनके मन की बात और परेशानियों को समझने की कोशिश कम लोग करते हैं। इस लेख ने बहुत सरल तरीके से यह समझाया है कि हर पीढ़ी की अपनी चुनौतियाँ होती हैं।
मुझे लगता है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि जेनजी किस तरह प्रतिक्रिया दे रही है, बल्कि यह समझना भी ज़रूरी है कि उनकी भावनाएँ क्या हैं और वे आखिर कहना क्या चाहते हैं। यदि उनकी बातों को धैर्य से सुना जाए और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास किया जाए, तो निश्चित रूप से कोई ऐसा रास्ता निकाला जा सकता है जिससे उनकी समस्याओं का समाधान भी हो और इस तरह के विरोध-प्रदर्शनों की आवश्यकता भी कम पड़े।
मुझे सबसे अच्छी बात यह लगी कि लेखक ने युवाओं की बात सुनने और उनसे संवाद बनाए रखने पर ज़ोर दिया है। मेरा मानना है कि जब हम युवाओं को समझने और उनकी बात सुनने की कोशिश करेंगे, तो वे भी हमारे विचारों का सम्मान करेंगे और सकारात्मक सहयोग के साथ आगे बढ़ेंगे। संवाद ही हर समस्या का सबसे अच्छा समाधान है।
बहुत ही विचारणीय, संतुलित और सुंदर लेख। लेखक को हार्दिक शुभकामनाएँ।