
डॉ. अनामिका दुबे निधि मुंबई
हम कहते हैं… कोई मौत-सा ख़ूबसूरत नहीं,
इसको पाने में… ज़िन्दगी छूट जाती यहीं।
इश्क़ की राह में… कितने ही मंजर बदले,
दिल ही टूटे तो फिर… कोई सूरत नहीं।
वक़्त के साथ सभी… रंग बदल जाते हैं,
रिश्तों में अब वो… पहली-सी हक़ीक़त नहीं।
ख़्वाब आँखों में सजे… थे जो सितारों जैसे,
अब तो जागे हैं मगर… कोई राहत नहीं।
दर्द इतना है कि… हँसते हुए भी रोते हैं,
ज़ख़्म ऐसे हैं जिन्हें… कोई मरहम नहीं।
तू मिला भी तो… बिछड़ने का सबब बन बैठा,
अब किसी शख़्स से दिल को… मोहब्बत नहीं।
चाँद-तारों से सजी… रात भी सूनी लगती,
जब तेरी याद के सिवा… कोई जन्नत नहीं।
‘निधि’ लफ़्ज़ों में छुपा लेती है अपने हर दर्द को,
वरना दुनिया को दिखाने की उसे आदत नहीं।
लेखिका के बारे में-
डॉ. अनामिका दुबे “निधि”
हिंदी प्रवक्ता के रूप में 4 वर्ष तथा अध्यापिका के रूप में 2 वर्ष कार्यरत रहीं। वे “राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच” की संस्थापिका हैं और विभिन्न मंचों व FM पर काव्य पाठ कर चुकी हैं। उनकी रचनाएँ दैनिक भास्कर सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उन्हें वाचस्पति मानद, कलम रत्न, साहित्य संगिनी, अजातशत्रु और साहित्य प्रभा जैसे कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनकी एकल पुस्तक “मेरी भावनाएं” प्रकाशित है और वे 100+ साझा काव्य संकलनों में योगदान दे चुकी हैं।
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