खुशी

“खुशी की सबसे बड़ी बाधा अक्सर हम खुद होते हैं। जो बातें हमारे नियंत्रण में नहीं, उन पर सोचते रहने से नकारात्मकता हमें घेर लेती है। दिनचर्या में थोड़ा बदलाव, मनपसंद काम के लिए समय और परोपकार यही आत्मा की सबसे सच्ची खुशी है।”

Read More

रेशमी कंबल

मीनाक्षी वर्मा, लेखिका, नई दिल्ली बहुत पुराने वक्त की बात है। सीताराम नाम का एक आदमी झोपड़ी में रहता था और मजदूरी किया करता था। एक बार मजदूरी करते वक्त उसने एक आदमी को रश्मि कम्बल बेचते देखा। कम्बल देखकर उसका उसे खरीदने का मन हुआ, लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे।वह घर आकर भी…

Read More

जरूरी

दामोदर ने कहा, “शहर में तीन दिन से कर्फ्यू था। आज हटते ही दो सौ रुपए की मजदूरी हुई। कल बाबा का श्राद्ध है, कुछ किराना ले आता हूँ।”
पत्नी ने चिंता जताई, “अम्मा की तबियत देख लो, पांच बार उल्टी की और बुखार भी तेज है।”
दामोदर ने पूछा, “फिर क्या करूँ?”
पत्नी ने कहा, “नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब के पास चलो। इलाज जरूरी है।”दामोदर ने मान लिया, “हाँ, सही है। पहले अम्मा का इलाज।”

Read More

चिंता छोड़, सार्थक चिंतन की ओर

“चिंता सचमुच चिता समान है। जीवन की अनहोनी को रोका नहीं जा सकता, पर छोटी-बड़ी चिंताओं से कैसे निपटना है, यह हमारे हाथ में है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन ही है—इंद्रियों के मोह में फँसा तो बंधन, और निर्विकार रहा तो मुक्ति। आँखें, कान, हृदय और मस्तिष्क—ये सब मिलकर हमारी चिंताओं का जाल बुनते हैं। गीता हमें सिखाती है कि सकारात्मक चिंतन और समदृष्टि अपनाकर ही मनुष्य चिंता से चिंतन की ओर बढ़ सकता है। मन का घर तभी स्वस्थ है जब उसमें प्रेम और संतुलन हो।”

Read More