व्यंग्य
लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़
लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसकी रीढ़ भीड़ और दिखावे के बोझ तले झुकती नजर आती है। चुनावी रैलियाँ संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गई हैं, जहाँ नागरिकों को गिना जाता है, समझा नहीं जाता। जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकार नहीं, बल्कि चुनावी उपहार की तरह परोसी जा रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में मतदाता धीरे-धीरे ग्राहक में बदलता जा रहा है। फिर भी उम्मीद कायम है जब जनता सवाल पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़ फिर से सीधी होने लगती है।
आत्ममुग्धता
धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।
एंटीडाट
हमारे समय की विडंबना यह है कि जो शिक्षा कभी आदर्शों का मंदिर थी, वही अब सौदेबाज़ी के गलियारों में बदलती जा रही है। मेडिकल डिग्री पाने की होड़ में लुटे गए विद्यार्थी, जब डॉक्टर बनकर समाज में उतरते हैं, तो कुछ सच में ईश्वर का रूप बनकर सेवा करते हैं, पर कुछ वही लूट की परंपरा विरासत में लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। बीमारी का इलाज तो मिलता है, पर कई बार इलाज जेब का भी हो जाता है। सेवा और मेवा के बीच की पतली रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है. लालच की इस बीमारी का असली “एंटीडाट” आखिर कहाँ मिलेगा?…….
मधु चौधरी की एक व्यंग्य रचना
स्कूटी वाली..
आज औरतें रॉकेट से लेकर एयरप्लेन तक उड़ा रही हैं, और फिर भी कुछ लोग स्कूटी चलाने पर सवाल उठाते हैं। सच तो यह है कि समस्या लड़कियों की ड्राइविंग नहीं, बल्कि कुछ लोगों की नीयत और सोच में है। हम औरतें हवा में अपने पंख फैलाकर आगे बढ़ती रहेंगी .किसी को मिर्ची लगे तो लगे।
महंगाई
आज की महंगाई ने जीवन को बहुत मुश्किल बना दिया है। हर चीज़ की कीमत बढ़ गई है और आम आदमी का घर चलाना कठिन हो गया है। पहले जो छोटी-सी चीज़ें आसानी से मिल जाती थीं जैसे मोटर या भिंडी . अब उन्हें खरीदना भी मुश्किल हो गया है। तेल न होने पर खाना बनाना भी मुश्किल हो जाता है और परेशानियाँ बढ़ जाती हैं। लोग पूछते हैं तो कुछ कह नहीं पाते, और ना पूछें तो मन में ही दुःख बढ़ता रहता है। महंगाई की मार से जीवन इतना जटिल हो गया है कि इसे अनदेखा करना भी मुश्किल है।
साहित्यिक चमत्कार
हित्य में अब चमत्कारों की कोई कमी नहीं रही। कुछ लेखक तो इतने पारंगत हो गए हैं कि बीस कहानियों को छह अलग-अलग पुस्तकों में बाँटकर छाप देते हैं—हर पुस्तक में पाँच कहानियाँ कॉमन! और जब यह भी कम पड़ता है तो बालकथा और कविता की पतली-पतली किताबें छपवाकर अपने खाते में पुस्तकों की संख्या बढ़ा लेते हैं।पाठक भी भाग्यशाली होते हैं—उन्हें एक ही कहानी पाँच–छह बार, अलग-अलग शीर्षकों से पढ़ने का अवसर मिलता है।
थर्मामीटर…
शिमला के एक मछलीघर से शुरू होती यह कविता आदमी की उस विडंबना तक पहुँचती है, जहाँ वह खुद को नियंता समझता है, जबकि उसकी अपनी लगाम कहीं और बंधी होती है।
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