ग़ज़ल

अर्चना वर्मा सिंह, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई

नहीं बात होती यहाँ ज़ात की
यही इक है खूबी ख़राबात की।

निकालो नहीं बात की खाल को
जरूरी है तफ़्तीश हर बात की?

ज़माने से उसकी अलग सोच थी
इसी बात ने जां ली सुकरात की।

कहानी रहें याद चींटी की जो
कभी बात करना न औक़ात की।

यही सीख देना सदा तिफ़्ल को
कभी मत सुनो बात अज्ञात की।

यकीं है जो खुद पे तो मुमकिन है सब
भला क्या ज़रूरत है ख़ैरात की।

ग़ज़ल की दिवानी हुई अर्चना
ख़बर भी इसे अब न दिन-रात की।

One thought on “ग़ज़ल

  1. अर्चना जी अच्छी रचना। अच्छा होगा अगर आप कठिन उर्दू शब्दों का भावार्थ भी साथ में लिख दें जैसे तिफ्ल़

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