आत्ममुग्धता
धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।
