अपनी राह: अँधेरे से उजाले तक

अँधेरे से उजाले की ओर बढ़ते व्यक्ति का प्रतीकात्मक दृश्य, आत्मविश्वास और अपनी राह बनाने की प्रेरक भावना को दर्शाती हिंदी कविता।

श्रीति कुमारी प्रसाद, सिलीगुड़ी

न पूछ उन रास्तों का पता,
जो औरों ने बनाए हैं।
अपनी मंज़िल खुद तलाश,
जो ख़्वाब दिल में सजाए हैं।

लोग कहेंगे, “मुश्किल है डगर,
इस रास्ते पर मत जाना।”
पर तू सुन अपने अंतर्मन की,
और खुद ही अपना रास्ता बनाना।

ठोकर लगे तो ग़म न कर,
गिरकर फिर संभलना सीख।
हर घाव को एक सबक बना,
और बढ़कर आगे चलना सीख।

जो आज घना अँधेरा है,
कल वही रोशनी लाएगा।
जो डर छुपा है सीने में,
कल हौसला बन मुस्काएगा।

खुद पर रख इतना अटूट यक़ीन,
कि तेरी शख्सियत बने पहचान।
क्योंकि इस मतलबी दुनिया में,
तू ही अपनी शान, और तू ही अपनी उड़ान।

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