बिल्कुल तुम्हारी तरह

नीरजा कृष्णा

आज मधु बहुत खिसियाई हुई थी। हर बात में माधव उसकी तुलना अपनी मम्मी से करने लगते थे। वह चिढ़कर बोली,
“आप हर समय, हर बात में मम्मी जी से मेरी तुलना क्यों करने लगते हो? मुझे अच्छा नहीं लगता।”

माधव मुस्कुराए,
“अरे, तुम्हें तो खुश होना चाहिए। मैं तुम्हारे हर क्रिया-कलाप में अपनी मम्मी की परछाई खोज ही लेता हूँ। बचपन से ही मम्मी के आँचल की छाँव तले रहने की आदत-सी पड़ गई थी। अब तुम मेरी ज़िंदगी में उन्हीं की प्रतिमूर्ति बनकर आ गई हो।”

मधु चुप रही।

माधव फिर बोले,”तुम चुप क्यों हो गईं? अभी तुमने बेसन का हलवा बनाया। उसे खाकर असीम आनंद मिला। एकदम मम्मी के हाथों वाला स्वाद था।”

यह सुनते ही मधु भड़क गई और लगभग चिल्लाते हुए बोली,
“आप मुझमें अपनी मम्मी की छवि देखते हैं, यह मेरे लिए गौरव की बात है। लेकिन मैं मधु हूँ और मधु ही बनकर रहना चाहती हूँ। आज से और अभी से आप यह तुलना करना छोड़ दीजिए।”

माधव ने मुस्कुराते हुए अपने दोनों कान पकड़ लिए और धीरे से कहा,”आगे से तुम्हारी और मम्मी की तुलना कभी नहीं करूँगा। लेकिन चलते-चलते एक बात कहने का मन कर रहा है… बोलो तो कह दूँ?”

मधु खिलखिला पड़ी,”आप नौटंकी खूब कर लेते हो। अब जो मन में है, उसे बोल ही डालो।”माधव ने इधर-उधर देखकर मधु के कान में फुसफुसाते हुए कहा- तुम मुझसे रूठती भी हो तो एकदम मम्मी वाले स्टाइल में ही रूठती हो। वो अगर सुबह मुझसे किसी बात पर रूठती थीं, तो शाम तक सब भूलकर बिल्कुल नॉर्मल हो जाती थीं… बिल्कुल तुम्हारी तरह।”

इतना कहते ही वह मधु के सामने से भागता नज़र आया।

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