सूर्योदय के समय जीवन-यात्रा का प्रतीक एक राहगीर और प्राचीन सराय का दृश्य

‘नाटक’

यह दार्शनिक कविता जीवन को एक सराय और सुख-दुख को एक नाटक के रूप में प्रस्तुत करती है। ‘मैं’ और अहंकार के मंथन के बीच यह रचना कर्म, परिवर्तन और प्रेम की त्रिवेणी का संदेश देती है। जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मबोध की रोशनी को उजागर करती यह कविता पाठक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है।

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मुक्ति की राह : ज्ञान, कर्म और परमधाम

आत्मा परमधाम की वासी है—पवित्र, दोषरहित। स्थूल लोक में कर्मों के प्रभाव से वह अपवित्र होती है, इसलिए स्वयं परमात्मा आकर ज्ञान के माध्यम से आत्मा को फिर से पावन बनाते हैं और उसे मुक्ति की ओर ले जाते हैं।

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शरीर नश्वर, आत्मा अमर

यह लेख आत्मा की अमरता, उसके निराकार स्वरूप और परमपिता परमेश्वर से उसके संबंध पर विचार करता है, यह बताते हुए कि शरीर नश्वर है पर आत्मा अजर-अमर है और वही हमारे कर्मों का साक्ष्य रखती है।

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