खिड़की के पास अकेली बैठी एक भारतीय महिला, चेहरे पर गहरी उदासी और आंखों में छलकता दर्द. कमरे में हल्की रोशनी और पृष्ठभूमि में धुंधली होती एक पुरुष आकृति, जो दूरी और रिश्ते के टूटने का प्रतीक है. दृश्य भावनात्मक पीड़ा, विश्वासघात और मानसिक अकेलेपन को यथार्थ रूप में दर्शाता है.

कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

कुछ पुरुष रिश्ते बड़ी आसानी से बनाते हैं और उतनी ही सहजता से तोड़ भी देते हैं. बिना किसी स्पष्टीकरण, बिना किसी टकराव के वे चुप्पी को हथियार बनाकर स्त्री को खुद ही रिश्ते से बाहर निकलने को विवश कर देते हैं. यह लेख उसी मौन छल, टूटते विश्वास और उस स्त्री की मानसिक पीड़ा की कहानी है, जो प्रेम को ईश्वर मान बैठती है और अंत में स्वयं को ठगा हुआ पाती है.

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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वो घर मेरा

वो मेरा पुराना घर… जहां न बेफिक्री की कोई सीमा थी, न रिश्तों में कोई दीवार। सालों बाद लौटने पर जैसे समय थम गया। हर कोना, हर दीवार, और बंद पड़ी घड़ी मानो कुछ कहने को बेताब थी। वहां अब भी माँ की पुकार गूंजती है, पर उस चूल्हे की आग बुझ चुकी है। सब कुछ वहीं था, लेकिन जीवन का शोर-गुल, हँसी और मिल बैठने की वो आत्मीयता कहीं खो गई थी। आज सबके अपने कमरे हैं, लेकिन दिलों की दूरी बढ़ गई है। कविता एक भावुक पुकार है – लौट चलें उस पुराने आँगन की ओर, जहाँ त्योहार सिर्फ रस्म नहीं, रिश्तों का उत्सव होते थे।”

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