Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
खिड़की के पास अकेली बैठी एक भारतीय महिला, चेहरे पर गहरी उदासी और आंखों में छलकता दर्द. कमरे में हल्की रोशनी और पृष्ठभूमि में धुंधली होती एक पुरुष आकृति, जो दूरी और रिश्ते के टूटने का प्रतीक है. दृश्य भावनात्मक पीड़ा, विश्वासघात और मानसिक अकेलेपन को यथार्थ रूप में दर्शाता है.

कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

कुछ पुरुष रिश्ते बड़ी आसानी से बनाते हैं और उतनी ही सहजता से तोड़ भी देते हैं. बिना किसी स्पष्टीकरण, बिना किसी टकराव के वे चुप्पी को हथियार बनाकर स्त्री को खुद ही रिश्ते से बाहर निकलने को विवश कर देते हैं. यह लेख उसी मौन छल, टूटते विश्वास और उस स्त्री की मानसिक पीड़ा की कहानी है, जो प्रेम को ईश्वर मान बैठती है और अंत में स्वयं को ठगा हुआ पाती है.

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खामोश कमरे में अकेली स्त्री खिड़की के पास बैठी बाहर देखती हुई, चेहरे पर प्रतीक्षा और टूटे प्रेम का भाव, शाम की धुंधली रोशनी और उदास वातावरण।

मुख़्तसर मुलाक़ात, लंबा इंतज़ार

यह कविता प्रेम के उस रूप को उजागर करती है जहाँ चाहने वाला टूटता है और जाने वाला वादा लेकर चला जाता है। शब्दों में ठहरा दर्द और अधूरा इंतज़ार इसकी आत्मा है।

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गठरी…

उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?

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