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गठरी…

निशा डांगे नायगांवकर, प्रसिद्ध कवयित्री

तुमने आवाज दी
और मैं निकल पड़ी
भावनाओं की गठरी उठाकर

नजदीक आने पर पता चला
तुम्हारे मन की हर एक गली सँकरी
तुम्हारे मन का हर एक कोना सँकरा

सँकरे गलियों में सें
सिकुड़कर चलते चलते
मैं भी सिकुड़ गयी…

चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा
अँधरे में दरबदर भटकते हुए
मैं तुम तक पहुँची…

तो देखा…
तुम तो बड़े खुश हो
और बड़े ही मशरूफ हो अपने आप में

ना तुम मेरा इंतजार कर रहे हो
ना तुम्हें मेरी ज़रूरत है

जहाँ अपनी ज़रूरत ना हो
वहाँ रुकना नहीं चाहिएँ
और लौटकर जाने का रास्ता तो मैं भूल चुकी हूँ

अब तुम ही बताओ
मैं क्या करूँ?
कैसे उठाऊँ बोझ
इस भावनाओ की गठरी का ?

6 thoughts on “गठरी…

  1. बहुत सटीक वर्णन बिछड़े हुए की पीड़ा का ।
    ” मैं क्या करूँ?
    कैसे उठाऊँ बोझ
    इस भावनाओ की गठरी का ?”
    वर्तमान के जीवन में , हम सब के लिए प्रकृति
    प्यार और खुश रहने की वजहें सहेजकर रखती है
    उसे ही ढूँढना है
    इस गठरी को उसी जगह छोड़कर कभी न देखो
    जो बीत गया सो बीत गया ।

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