टूटे दिल वाली स्त्री खामोशी से अंधेरे कमरे में बैठी हुई, आंखों में दर्द और विश्वासघात का भाव

मेरा संसार

यह कविता एक ऐसे टूटे हुए मन की आवाज़ है, जिसने अपने पूरे संसार को एक ही व्यक्ति में समेट लिया था. भरोसे, प्रेम और समर्पण के बदले उसे झूठ, छल और दर्द मिला. यह रचना विश्वास के टूटने से उपजे आंतरिक संघर्ष, पीड़ा और आत्मबोध को बेहद मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करती है

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खामोश कमरे में अकेली स्त्री खिड़की के पास बैठी बाहर देखती हुई, चेहरे पर प्रतीक्षा और टूटे प्रेम का भाव, शाम की धुंधली रोशनी और उदास वातावरण।

मुख़्तसर मुलाक़ात, लंबा इंतज़ार

यह कविता प्रेम के उस रूप को उजागर करती है जहाँ चाहने वाला टूटता है और जाने वाला वादा लेकर चला जाता है। शब्दों में ठहरा दर्द और अधूरा इंतज़ार इसकी आत्मा है।

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कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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गठरी…

उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?

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तुम कितना बदल गए हो

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

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