मुख़्तसर मुलाक़ात, लंबा इंतज़ार

खामोश कमरे में अकेली स्त्री खिड़की के पास बैठी बाहर देखती हुई, चेहरे पर प्रतीक्षा और टूटे प्रेम का भाव, शाम की धुंधली रोशनी और उदास वातावरण।

अरुणा रावत अरु, लेखिका, बंगलौर

उसने कहा
“मैं चाहता हूँ, तुम मुझे टूटकर चाहो…”
वह आया
और मुझे तोड़कर चला गया।

मुख़्तसर-सी मुलाक़ात रही उससे,
वह मेरे ज़ख़्मों को
कुरेदकर चला गया।

जाते-जाते बोला-
“तुमने मुझे गले भी नहीं लगाया।”
मेरी गर्म हथेली
अनायास ही
उसके गालों को छू गई
मेरे निस्वार्थ प्रेम का स्पर्श।

उस निर्मल छुअन को
अपने साथ लेकर,
वह दोबारा आने का वादा कर
चला गया।

और फिर
वह न आया…
अब तक।
इंतज़ार
बस उसका रह गया।

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