कंफर्मेशन बॉयस की गहरी गिरफ़्त

रेणु सिद्धू, साइकोलाजिस्ट एवं लेखिका, जयपुर
मनुष्य एक सोचने-समझने वाला प्राणी है, परंतु उसकी सोच हमेशा निष्पक्ष नहीं होती। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही देखने, सुनने और मानने लगते हैं। यही प्रवृत्ति मनोविज्ञान में “कंफर्मेशन बॉयस” (Confirmation Bias) कहलाती है। सरल शब्दों में कहें तोजब हम किसी धारणा को बना लेते हैं, तो उसके विरुद्ध साक्ष्य नहीं, बल्कि उसके समर्थन में प्रमाण ढूंढने लगते हैं।
हम यह भूल जाते हैं कि हमारी विचारधारा, हमारी राय, या हमारा नजरिया भी गलत हो सकता है। यह मानसिक जाल इतना महीन होता है कि हमें इसका एहसास तक नहीं होता। राजनीति और मनोरंजन की दुनिया इस मानसिकता की सबसे स्पष्ट मिसालें हैं। कोई भी नेता या अभिनेता जब किसी का प्रिय बन जाता है, तो उसके अनुयायी उसकी हर बात को सही मानने लगते हैं। अगर वह व्यक्ति गलती भी करे, तो हम गलती नहीं देखते बल्कि बहाना ढूंढ लेते हैं। हमारे लिए वह व्यक्ति “सही” साबित होना ज़रूरी होता है, सच्चा होना नहीं।
यह प्रवृत्ति केवल समाज या मीडिया तक सीमित नहीं है, हमारे निजी जीवन में भी यही पैटर्न देखने को मिलता है। रिश्तों, निर्णयों, यहां तक कि खुद के विचारों को लेकर भी हम साक्ष्यों से नहीं, भावनाओं से संचालित होते हैं। हम सच्चाई को नहीं, अपनी सच्चाई को खोजते हैं।
असल में दिक्कत सच्चाई में नहीं, हमारे देखने के तरीके में होती है। जैसे धूल भरे चश्मे से साफ दृश्य भी धुंधले दिखते हैं, वैसे ही पक्षपात भरी सोच से सच्चाई विकृत हो जाती है।इसलिए सच्चाई को समझने से पहले ज़रूरी है कि हम अपने “मान्यता के चश्मे” को साफ करें। क्योंकि कई बार दाग हकीकत में नहीं होते दाग तो चश्मे पर ही होते हैं।

Renu ji bahut sachhi aur sahi baat aapne is lekh ke madhyam se batai hai ….yeh pattern hamari rojmara ki zindgi mein aksar dikh jate hai .
बहुत सही बात लिखी है आपने लेख में
आपके अगले लेख का इंतजार रहेगा।