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सच या मान्यता ?

हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही देखने और मानने लगते हैं। यही प्रवृत्ति “कंफर्मेशन बॉयस” कहलाती है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो, हमारा दिमाग उसे उसी रूप में देखना चाहता है जैसा हम मानते हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति, विचार या विचारधारा से जुड़ने के बाद हम उसकी गलतियाँ भी नजरअंदाज कर देते हैं। असल में दिक्कत सच्चाई में नहीं होती दिक्कत हमारे देखने के “चश्मे” में होती है। कई बार दाग हकीकत में नहीं, चश्मे पर ही होते हैं।

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