Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
गाँव के घर के बाहर प्रतीक्षा करते बुजुर्ग माता-पिता और मिट्टी, पेड़ों व अपनापन से भरा ग्रामीण दृश्य।

चलो चलें अब गाँव

यह कविता गाँव की मिट्टी, रिश्तों की गर्माहट और अपनों के स्नेह की ओर लौटने की भावनात्मक पुकार है। शहर की भागदौड़ में छूट गए गाँव, बूढ़े माता-पिता और सूने खलिहानों की याद मन को बार-बार अपनी जड़ों की ओर खींचती है। कविता बताती है कि गाँव में रिश्ते दिखावे से नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम से निभाए जाते हैं, जहाँ सुख-दुख बाँटकर जीवन जिया जाता है। पीपल, बरगद और आम की छाँव, शुद्ध हवा और मिट्टी का सहज स्पर्श उस आत्मीय सुख का एहसास कराते हैं, जो कहीं और दुर्लभ है।

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रास आई न तन्हा है ये ज़िंदगी

ज़िंदगी तन्हा लगती है जब तक कोई साथी नहीं होता। चाहे कितनी भी भक्ति कर लो या चारों ओर दुनिया की दौड़-धूप हो, दिल को सुकून केवल किसी प्रिय के साथ से मिलता है। तन्हाई चारों ओर हो तो हर खुशी अधूरी लगती है, और सिर्फ एक साथी के होने से ही जीवन में हल्की मुस्कान और राहत महसूस होती है। जीवन की सच्ची सुंदरता तब उजागर होती है जब कोई पास हो, बातों में मुस्कान बिखेरता हो और हर ग़म को कम कर देता हो। यही सरल, पर अनमोल एहसास है — एक साथी का होना ही जीवन को पूरा बनाता है।

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एक प्रतीक्षा…

यह कविता जीवन में प्रतीक्षा की गहराई को उजागर करती है। इसमें मनुष्य के उस भाव को चित्रित किया गया है जहाँ वह प्रकृति या ईश्वर की अदृश्य उपस्थिति को महसूस करता है—एक ऐसा विश्वास जो जीवन को समेटता है, उसे संपूर्णता देता है। प्रतीक्षा केवल किसी घटना की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनाओं, विरासत की प्रतिध्वनियों और जीने के अनगिनत रंगों की है। यह प्रतीक्षा जीवन की हर ध्वनि, रूप, पहचान और संबंध को आत्मसात करने की है, जिसमें प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अंश समाहित हो। कविता कहती है कि सच्ची प्रतीक्षा वही है, जिसमें जीवन और ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अहसास जुड़ा हो।

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