
डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा
तूफ़ान मेल की वह यात्रा भुलाई नहीं जा सकती थी। निशा और अर्जुन अब जीवन के आख़िरी पड़ाव पर पहुँच चुके थे, किन्तु तूफ़ान मेल की छुक-छुक के बीच अचानक अर्जुन की आँखों में अपने लिए कुछ देखकर निशा अचंभित रह गई थी।
बात उन दिनों की है जब पटना से दिल्ली की यात्रा के लिए अक्सर लोग तूफ़ान मेल या डिलक्स ट्रेन को वरीयता देते थे, क्योंकि दोनों की चाल अच्छी थी और समय से पहुँचा देती थीं। उस दिन भी निशा और अर्जुन ने पटना से दिल्ली के लिए तूफ़ान मेल का टिकट लिया था। टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया था, इसलिए साइड वाली बर्थ पर बैठने भर की जगह मिली थी। टी.टी. ने बाद में बर्थ अलॉट कराने का आश्वासन दिया था।
अर्जुन को दिल्ली पहुँचना आवश्यक था, इसलिए वह समय पर अपनी सीट पर बैठ गया। ट्रेन खुलने में काफ़ी देर थी, इसलिए उसने अभी-अभी खरीदी हुई एक मैगज़ीन पढ़ना शुरू कर दिया। उसकी आँखें मैगज़ीन के पीछे छिपी थीं।
अचानक एक जानी-पहचानी खुशबू उसके नथुनों से टकराई। उसने आँखें उठाई और जो देखा, उससे उसे खुशी भी हुई और गहरा आघात भी। उसे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था। उसकी आँखें धोखा नहीं खा रही थीं. वह निशा ही थी, जो अपना सामान व्यवस्थित करने में व्यस्त थी। उसकी नज़र अर्जुन पर पड़ी ही नहीं थी, किंतु अर्जुन उसे स्पष्ट देख पा रहा था।
उसने महसूस किया कि निशा के रंग-रूप में काफ़ी बदलाव आ गया है। बालों में चांदी-सी सफेदी चमक रही थी। चेहरे पर झुर्रियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। फिर भी उसके भीतर वही कशिश बची थी, जिससे कोई आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता था। अर्जुन तो प्रारंभ से ही उसका उपासक था.वह उसकी आराध्य थी। वह एकटक उसे देख रहा था। तभी निशा की नज़र उस पर पड़ी और सहसा दोनों के मुँह से निकला.
“अरे तुम! यहाँ कैसे? कैसे हो?”
उत्तर-“ठीक हूँ।”
दोनों मौन में अपने अतीत की गलियों में भटकने लगे।
छह वर्ष पहले दोनों ने शहर के एक ही कॉलेज में प्रवेश लिया था। ग्रेजुएशन दोनों ने साथ किया। संयोग ऐसा रहा कि दोनों ने एक ही विषय में एम.ए. करने का निर्णय किया। इससे दोस्ती गहराती गई। एम.ए. तक पहुँचते-पहुँचते उनके बीच प्रेम के बीज कब अंकुरित हो गए, किसी को पता ही नहीं चला। एक-दूसरे को देखे बिना रह पाना कठिन हो गया था। अर्जुन का युवा हृदय उसके सान्निध्य को पाने को बेचैन रहने लगा।
इसी बेचैनी में उसने एक गलती कर दी, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। निशा उस घटना से बेहद आहत हुई।
हुआ यूँ कि पटना विश्वविद्यालय में ट्यूटोरियल कक्षा होती थी, जहाँ सीमित संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित होते थे और शिक्षक से अपनी समस्याएँ साझा करते थे। इत्तफ़ाक़ से उस दिन कमरे में कोई नहीं था-सिर्फ़ निशा और अर्जुन।
निशा उस दिन बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी। उसे देखकर अर्जुन का मन डोल गया। वह निशा को अपनी बाँहों में भरने और उसके माथे को चूमने को बेचैन हो उठा। अचानक उसने उसे अपनी ओर खींचा और चूमने का प्रयास किया।
निशा झटके से अलग हुई और नाराज़ होकर बोली-
“ये क्या कर रहे हो? मैं वैसी लड़की नहीं हूँ, जैसा तुम समझ रहे हो!”
अर्जुन-“तो क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती?”
निशा-“करती हूँ, बेहद! लेकिन मर्यादा में रहकर। विवाह से पहले ऐसा व्यवहार मुझे स्वीकार नहीं। मैं नहीं जानती थी कि तुम वासना के इतने वशीभूत हो जाओगे कि तुम्हें समय और स्थान का होश नहीं रहेगा।”
अर्जुन-क्षमा कर दो… मैं भावनाओं में बह गया था। मुझे नहीं पता था कि मेरी हरकत तुम्हें इतना दुख देगी।”
निशा ग़ुस्से में कमरे से बाहर निकल गई।
कुछ दिनों बाद एम.ए. की परीक्षा समाप्त हो गई और दोनों अपने-अपने घर चले गए। संवाद टूट गया, पर प्रेम नहीं टूटा। बाद में निशा ने घटना को दूसरी दृष्टि से देखा तो उसे लगा.प्रेम में वासना का थोड़ा अंश होना स्वाभाविक है, इसलिए अर्जुन ने कोई अक्षम्य अपराध नहीं किया था।
और आज जब ट्रेन में आमने-सामने मिले, तो दबा हुआ प्रेम फिर से जाग उठा। दोनों के हृदय बेचैन थे कि बात कौन शुरू करे। अंततः अर्जुन ने पूछा—
“कहाँ थी इतने दिनों तक?”
निशा-“तुम कहाँ थे?”
अर्जुन-“कहीं न कहीं तो था ही, वरना आज तुम्हारे सामने नहीं होता।”
निशा-“मैं भी कहीं थी, वरना तुम्हारे सामने कैसे होती?”
(निशा मन में सोच रही थी-कहीं ईश्वर ने यह मुलाक़ात तो नहीं करवाई? क्या अर्जुन आज भी उसे याद करता होगा? उसने भी तो उसे कभी दिल से निकाला नहीं था।)
“क्या कर रही हो आजकल?”
निशा-“दिल्ली के एक स्कूल में टीचर हूँ। और तुम?”
अर्जुन-“मैं गाज़ियाबाद के एक कॉलेज में व्याख्याता हूँ।”
निशा-“तुम्हारे परिवार में कौन-कौन है?”
अर्जुन-“कौन-सा परिवार? माता-पिता गुजर गए। मैं अकेला हूँ।”
निशा-“और तुम्हारी पत्नी?”
अर्जुन—“क्यों जले पर नमक छिड़कती हो? शादी नहीं की।
दिल में बस एक को जगह दी थी… दूसरे के लिए जगह बची ही नहीं।”
निशा उसकी मन:स्थिति समझ रही थी।
अर्जुन ने भी पूछ लिया-“तुम्हारे घर में कौन है? माता-पिता? पति?”
निशा-“ओहो! एक साथ इतने सवाल!
माँ-पिताजी अब नहीं रहे। भाई विदेश में बस गया। मैं अकेली रहती हूँ।”
अर्जुन-“और तुम्हारी शादी?”
निशा-“मैंने भी शादी नहीं की।”
(वह बताना चाहती थी कि उसने लम्बा समय उसकी याद में बिताया, पर कैसे बताती? संबंध तो टूट चुका था।)
आधी रात यूँ ही बात करते बीत गई। ट्रेन अपनी रफ़्तार से गाज़ियाबाद स्टेशन पहुँची।
अर्जुन ने हाथ बढ़ाते हुए कहा-
“मेरे साथ उतरना चाहोगी?
मेरे घर को साँवरना चाहोगी-तो चलो। मैं बाध्य नहीं करूँगा।”
निशा को जैसे इसी पल का इंतज़ार था। उसने अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया और दोनों उतर गए।
मन की सारी मलिनता धुल चुकी थी।
दो स्वच्छ हृदय, स्वच्छ आत्मा लिएएक नए घर की ओर चल पड़े।

बहुत सुंदर और भावुक कहानी । मंजुलताजी
धन्यवाद मधु जी। आप का प्रोत्साहन
हौसला बढ़ाता है।