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प्रेम में…

सुरभि ताम्रकार, शावि, लेखिका, दुर्ग

प्रेम में
स्त्रियां न पत्नी हुईं,
न प्रेयसी
वो बन गईं मां।

प्रेम में पुरुष न बन पाया
आदमी, न प्रेमी
पर वो बन गया शिशु-सा।

प्रेम में पशु में भी पशुत्व न रहा,
वो संत-सा हो गया।

अब लगता है , प्रेम क्रांति है।
जो तुम्हारा समय, तुम्हारे भाव, तुम्हारी ज़िंदगी
से भी बढ़कर
तुम्हें बदल देती है।

मां, शिशु और संत की तरह
निश्चल, निष्प्राण, निर्मुक्त-सा।

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