इंतज़ार

कविता सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर

इल्म तो बस इतना ही है ज़िंदगी से,
कि तेरे इंतज़ार में
कितनी रातें, कितने दिन गुज़ार दिए।

खामोशी क्या कहना चाहती है,
जब दिल समझ नहीं पाता
तो इन फ़िज़ाओं में आकर
तेरे दीदार का इंतज़ार करता हूँ।

मगर तेरे इंतज़ार के इस इल्म में
अब ये फ़िज़ाएँ भी बेवफ़ाई-सी करने लगी हैं,
क्योंकि कहीं-न-कहीं
ये भी मेरे इंतज़ार में उम्मीद लगाए बैठी थीं
मेरी खामोशी को ख़ुशी में बदलने के इंतज़ार में थीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *