होली और रंगपंचमी पर लगने वाला डोल मेला

मध्यप्रदेश के गांव में होली के बाद लगने वाला डोल मेला और अंगारों पर चलते श्रद्धालु मध्यप्रदेश के गांव में होली के बाद लगने वाला डोल मेला और अंगारों पर चलते श्रद्धालु

मध्यप्रदेश के ग्रामीण जीवन की अनोखी परंपरा

आस्था, साहस और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम

ग्राम झरावदा से सुरेश परिहार (संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे) की रिपोर्ट

भारत त्योहारों का देश है और हर क्षेत्र में त्योहारों को मनाने की अपनी अलग परंपराएँ और रंग होते हैं. मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में होली और रंगपंचमी का उत्सव केवल रंग-गुलाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर कई गांवों में डोल या डोल मेला आयोजित किया जाता है. उज्जैन जिले के महिदपुर रोड क्षेत्र के आसपास स्थित झरावदा, गोगापुर और कसारी गांवों में भी होली के बाद यह परंपरा बड़े उत्साह के साथ निभाई जाती है.
समय के साथ इस डोल मेले का स्वरूप जरूर बदला है, लेकिन आज भी इसमें ग्रामीण जीवन की सौंधी खुशबू साफ महसूस की जा सकती है. पहले इस मेले में बर्फ की कुल्फी, बर्फ के गोले, सेव-जलेबी और देसी पकवानों की दुकानें लगती थीं. अब बदलते समय के साथ गांवों में भी शहर का असर दिखने लगा है.


इस बार होली के अवसर पर मुझे झरावदा गांव में लगने वाले डोल मेले का आनंद लेने का अवसर मिला. यहां परंपरानुसार झरादेश्वर महादेव मंदिर में स्नान करने के बाद श्रद्धालु गीले कपड़ों में ही हाथों में तांबे या पीतल का लोटा लेकर दहकते अंगारों पर चलते हैं. इस अनोखे अनुष्ठान में बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवतियांसभी श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं.

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डोल मेला क्या होता है
डोल मेला दरअसल एक प्रकार का धार्मिक और सामाजिक उत्सव है, जिसमें पूरा गांव एक साथ मिलकर भाग लेता है.
इस आयोजन में देवताओं की डोली निकालना, लोकगीत गाना, नृत्य करना, मेले लगना और कई स्थानों पर अंगारों पर चलने जैसी परंपराएँ निभाई जाती हैं.
ग्रामीण मध्यप्रदेश में डोल शब्द का संबंध आमतौर पर देवताओं की डोली या जुलूस से माना जाता है. होली के समय गांव के मंदिरों से देवी-देवताओं की प्रतिमा या डोली को बाहर निकालकर पूरे गांव में भ्रमण कराया जाता है.
जब यह डोली गांव की गलियों से गुजरती है, तब लोग ढोल-नगाड़ों और शहनाई की धुन पर नाचते-गाते उसके साथ चलते हैं. जगह-जगह लोग देवता की आरती करते हैं और गुलाल अर्पित करते हैं. इसी कारण पूरे गांव में मेले जैसा वातावरण बन जाता है, इसलिए इसे डोल मेला कहा जाता है.
हालांकि इस परंपरा का स्वरूप क्षेत्र के अनुसार थोड़ा बदलता है, लेकिन इसका मूल भाव सामूहिक आस्था और उत्सव ही रहता है. कई गांवों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. बुजुर्ग बताते हैं कि पहले के समय में यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गांव की एकता और सामूहिकता का प्रतीक भी माना जाता था.


होली से रंगपंचमी तक चलता है उत्सव
मध्यप्रदेश में होली का उत्सव कई दिनों तक चलता है. इसकी शुरुआत होलिका दहन से होती है, जब बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में अग्नि प्रज्वलित की जाती है. इसके अगले दिन धुलेंडी पर रंग खेला जाता है. इसके बाद भी उत्सव समाप्त नहीं होता. कई स्थानों पर पांचवें दिन रंगपंचमी के अवसर पर बड़े आयोजन किए जाते हैं.यही वह समय होता है जब गांवों में डोल मेला और धार्मिक जुलूस आयोजित किए जाते हैं. इस दौरान गांवों में फाग गीत गाए जाते हैं, लोकनृत्य होते हैं और लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होकर उत्सव का आनंद लेते हैं.


अंगारों पर चलने की अनोखी परंपरा
मध्यप्रदेश के कुछ गांवों में डोल मेले के दौरान अंगारों पर चलने की परंपरा भी देखने को मिलती है. यह परंपरा लोगों की गहरी आस्था और साहस का प्रतीक मानी जाती है.गोगापुर, झरावदा और कसारी गांवों में यह परंपरा वर्षों से निभाई जा रही है. इस अनुष्ठान में पहले लकड़ियों का बड़ा ढेर जलाकर अग्निकुंड तैयार किया जाता है. जब लकड़ियां पूरी तरह जलकर अंगारों में बदल जाती हैं, तब उन्हें जमीन पर फैला दिया जाता है. इसके बाद श्रद्धालु नंगे पैर इन जलते अंगारों पर चलते हैं.गांव के लोगों का विश्वास होता है कि सच्ची श्रद्धा के साथ अंगारों पर चलने से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

लेखक डोल परंपरा में मिठाई की दुकान लगाकर परंपरा का निर्वाह करने वाले विश्वकर्मा परिवार के संतोष विश्वकर्मा के साथ तथा कपड़ा व्यवसायी श्याम गुलाटी, पूरन पंजाबी, आनंद त्रिवेदी, भेरुलाल पोरवाल, जगदीश मिस्त्री, अशोक बरड़िया व अन्य मित्रों के साथ

डोल के अवसर पर गांव में सचमुच मेला लग जाता है. आसपास के गांवों से भी लोग इसमें शामिल होने आते हैं.झरावदा में लगने वाले डोल मेले में बालकृष्ण विश्वकर्मा, संतोष विश्वकर्मा और अनिल विश्वकर्मा सहित विश्वकर्मा परिवार के सदस्य पिछले करीब 50 वर्षों से जलेबी और भजिए की दुकान लगाते आ रहे हैं.जहां पहले केवल पारंपरिक खान-पान की दुकानें लगती थीं, वहीं अब समय के साथ यहां आइसक्रीम, जूस, पिज्जा, बर्गर, चाट और पानीपुरी के स्टॉल भी नजर आने लगे हैं.इसके साथ ही महिलाओं के लिए घड़ियां, सूट, जीन्स, आर्टिफिशियल ज्वेलरी, जूते-चप्पल, सैंडिल और पर्स जैसी वस्तुओं की दुकानें भी लगने लगी हैं.बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के बावजूद इस मेले में पुरानी परंपराओं की झलक अब भी दिखाई देती है, जो इसे खास बनाती है.

लोकगीत और नृत्य की परंपरा
डोल मेले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लोकगीत और नृत्य भी होता है. होली के अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में फाग गीत गाने की परंपरा बहुत पुरानी है. इन गीतों में भगवान कृष्ण और राधा की होली, प्रेम और हास्य-व्यंग्य के भाव दिखाई देते हैं.ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की धुन पर गाए जाने वाले ये गीत वातावरण को पूरी तरह उत्सवमय बना देते हैं.कई जगहों पर महिलाएं समूह में बैठकर पारंपरिक होली गीत गाती हैं, जबकि पुरुष ढोल-नगाड़ों के साथ नृत्य करते हैं.

लेखक डोल परंपरा में मिठाई की दुकान लगाकर परंपरा का निर्वाह करने वाले विश्वकर्मा परिवार के संतोष विश्वकर्मा के साथ तथा कपड़ा व्यवसायी श्याम गुलाटी, पूरन पंजाबी, आनंद त्रिवेदी, भेरुलाल पोरवाल, जगदीश मिस्त्री, अशोक बरड़िया व अन्य मित्रों के साथ

विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं
मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों में डोल और रंगपंचमी से जुड़ी अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं. डोलचा मार रंगपंचमी राजगढ़ और नरसिंहगढ़ क्षेत्र में डोलचा मार रंगपंचमी की परंपरा काफी प्रसिद्ध है. इसमें लोग लोहे के बर्तन (डोलचा) में रंगीन पानी भरकर एक-दूसरे पर डालते हैं.कहा जाता है कि यह परंपरा राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही है.
इंदौर की रंगपंचमी गेर-इंदौर में रंगपंचमी के दिन गेर नामक विशाल जुलूस निकलता है, जिसमें हजारों लोग शामिल होते हैं और सड़कों पर रंग-गुलाल उड़ाया जाता है.हालांकि यह आयोजन शहरी क्षेत्र का है, लेकिन इसकी प्रेरणा भी ग्रामीण परंपराओं से ही मानी जाती है.
डोल मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता का प्रतीक भी है. इस दिन गांव के लोग अपने पुराने मतभेद भूलकर एक साथ उत्सव मनाते हैं. लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, मिठाई बांटते हैं और शुभकामनाएं देते हैं.गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले के समय में डोल मेला गांव की सामूहिक पहचान का हिस्सा हुआ करता था. यह अवसर लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का माध्यम बनता था.
पर्यटन की संभावना
डोल मेले और इससे जुड़ी परंपराएं इतनी अनोखी हैं कि वे ग्रामीण पर्यटन के लिए भी आकर्षण बन सकती हैं.
यदि इन आयोजनों का सही तरीके से प्रचार किया जाए तो देश-विदेश के पर्यटक भी इन अनूठी परंपराओं को देखने के लिए मध्यप्रदेश के गांवों में आ सकते हैं. इससे स्थानीय लोगों को आर्थिक लाभ भी मिल सकता है और उनकी संस्कृति को नई पहचान भी मिल सकती है.मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में होली और रंगपंचमी के अवसर पर आयोजित होने वाला डोल मेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण है.
देवताओं की डोली, लोकगीत, नृत्य, मेले का उत्साह और कहीं-कहीं अंगारों पर चलने जैसी अनोखी परंपराएं इस आयोजन को विशेष बनाती हैं. यह परंपरा आज भी ग्रामीण समाज को जोड़ने और उनकी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का काम कर रही है. होली के रंगों के साथ-साथ यह उत्सव विश्वास, साहस और सामूहिकता के रंगों से भी सराबोर होता है, जो मध्यप्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है.