
डॉ. संजुला सिंह, संजू, प्रसिद्ध लेखिका जमशेदपुर (झारखंड)
वैसे तो भारतीय संस्कृति में नारी को बहुत महत्व दिया गया है।
कहा भी गया है..
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।”
अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता विशेष रूप से निवास करते हैं।
परंतु वर्तमान समय में लोग इस सत्य को भूलते जा रहे हैं। अक्सर देखने को मिलता है कि हर जगह नारी का अपमान हो रहा है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है। ज्यादातर लोग नारी को केवल भोग की वस्तु समझकर उसे अपने तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं और करते भी हैं, जबकि ऐसा सोचना भी पाप है। नारी केवल भोग की वस्तु हो ही नहीं सकती। नारी तो सदा-सर्वदा से पूजनीय रही है।
एक नारी में वह क्षमता है जो भगवान को भी अपनी कोख में नौ महीने रखकर इस धरा पर जन्म देती है।
वह नारी ही है जो अपनी शक्ति से देवताओं को भी परास्त कर उनके अहंकार का दमन कर सकती है। इसका जीता-जागता उदाहरण हमारी माता अनसूया हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या और शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश. तीनों को बालक बना दिया था और उनके अहंकार को शांत किया था।
नारी हर हाल में अपनी रक्षा करना जानती है। इसलिए नारी “अबला” नहीं, बल्कि “सबला” है।
हाँ, कई स्थानों पर नारी दूसरों की खुशियों की खातिर अपने सुखों का त्याग कर देती है। अपने बलिदान और त्याग के कारण कुछ अज्ञान लोगों की नजर में वह अबला प्रतीत होने लगती है।
यह अत्यंत विडंबना की बात है कि नारी के त्याग, बलिदान, ममता, करुणा और वात्सल्य को लोग समझ नहीं पाते। यही उनका दुर्भाग्य है।
नारी तो सृष्टि की रचयिता है। एक नारी के हाथ में दोनों ही क्षमताएँ हैं.यदि वह सृष्टि का सृजन कर सकती है, तो आवश्यकता पड़ने पर संहार भी कर सकती है। इसका भी जीवंत उदाहरण हमारी माँ दुर्गा और माँ काली हैं।
पुरुष चाहे स्वयं को कितना भी महान क्यों न समझे, पर वह कभी भी सृष्टि का निर्माता नहीं हो सकता। फिर भी न जाने क्यों लोग इस सच्चाई से मुँह फेरते हैं। यह सचमुच बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं नारी पर कुछ लिख पाऊँ मेरी कलम में शायद वह क्षमता नहीं है। फिर भी मैंने अपनी बुद्धि और भावना के अनुसार विश्व की सभी नारियों के लिए अपने विचार व्यक्त करने का एक छोटा-सा प्रयास किया है।
सच तो यह है कि नारी का संपूर्ण चित्रण शब्दों में करना किसी के लिए भी संभव नहीं है, क्योंकि नारी स्वयं में पूर्ण है। नारी ईश्वर की बनाई वह सुंदर रचना है, जिसे देखकर स्वयं ईश्वर भी आश्चर्यचकित हो जाएँ।एक नारी में वे सभी गुण विद्यमान होते हैं, जो शायद ही किसी पुरुष में मिलें ममता, करुणा, त्याग, तपस्या, वात्सल्य आदि।
नारी हृदय से जितनी कोमल होती है, उतनी ही साहसी और धैर्यवान भी होती है। उसके साहस और धैर्य की बराबरी पुरुष भी कई बार नहीं कर पाते। पुरुष जहाँ कई बार अहंकार में डूब जाता है, वहीं नारी सदैव कोमल और मधुर बनी रहती है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि नारी कमजोर होती है।नारी को कमजोर समझना सबसे बड़ी मूर्खता और दुर्भाग्यपूर्ण सोच है।
नारी हर परिस्थिति में स्वयं को ढालने की क्षमता रखती है। जैसे-
नारी कोमल, निर्मला
होती फूल समान,
पर वक्त पड़े तो थाम ले
बरछी, तीर, कमान।
अंत में मैं इतना ही कहना चाहूँगी कि नारी हर रूप में सर्वश्रेष्ठ है—
चाहे वह किसी की पत्नी हो,
किसी की बहन हो,
किसी की बेटी हो,
या किसी की प्रेमिका।
वह जिस भी रूप में हो, हर रूप में श्रेष्ठ और सम्माननीय है।
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बहुत सुन्दर रचना
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अति सुन्दर