मैं लिखने बैठी हूँ

मैं लिखने बैठी हूँ – भावनाओं और रचनात्मकता पर आधारित हिंदी कविता

स्मिता, प्रसिद्ध लेखिका, रांची

मैं लिखने बैठी हूँ,
मन में उमड़ते-घुमड़ते भाव,
शब्दों का तेज बहाव।

मैं लिखने बैठी हूँ,
कुछ अनकहे एहसास,
जीवन की एक आस।

मैं लिखने बैठी हूँ,
दिल के हर जज़्बात,
आँखों के हर अल्फ़ाज़।

मैं लिखने बैठी हूँ,
बिन मौसम बरसात,
अपने सारे ख़्वाब।

मैं लिखने बैठी हूँ,
कोहरे में डूबी रात,
हर दिन का उजास।

मैं लिखने बैठी हूँ,
कसमसाती चुप्पियाँ,
हलचल मचाता आक्रोश।

मैं लिखने बैठी हूँ,
खामोशी में लिपटा शोर,
सन्नाटे में गूँजती आवाज़।

मैं लिखने बैठी हूँ,
आँसुओं की धार,
प्रकृति का आभार।

मैं लिखने बैठी हूँ,
बच्चों की किलकारी,
प्यारी-मीठी लोरी।

मैं लिखने बैठी हूँ,
माँ की दुआएँ,
पिता की परवाह।

मैं लिखने बैठी हूँ,
प्रेम का स्पंदन,
प्रिय का आलिंगन।

मैं लिखने बैठी हूँ,
गंगा के घाट,
मणिकर्णिका की आग।

मैं लिखने बैठी हूँ,
जीवन के हर रंग,
मृत्यु की तरंग।

मैं लिखने बैठी हूँ,
आत्मा की आवाज़,
दिल की हर एक बात।

6 thoughts on “मैं लिखने बैठी हूँ

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