आत्मविश्वास से खड़ी एक भारतीय महिला, हाथ में किताब और कलम लिए, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक भाव लिए हुए।

हाँ, मैं एक स्त्री हूँ…

यह कविता उस स्त्री की आवाज़ है जो समाज की परिभाषाओं से परे अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहती है। संघर्ष, आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी यह रचना स्त्री-अस्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति है।

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रात में बालकनी में बैठा एक व्यक्ति हाथ में चाय लिए किसी प्रिय स्त्री को याद करते हुए भावुक भाव में शहर की रोशनियों को देख रहा है।

बालकनी की उस रात में तुम…

रात की खामोशी, अधूरी चाय और बालकनी में बैठा एक व्यक्ति जो एक ऐसी स्त्री को याद कर रहा है, जिसने उसे सिखाया कि सपनों को जिम्मेदारियों के बीच भी जिंदा रखा जा सकता है।

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