
रश्मि पटेल, मुंबई
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन,
सदियों से भोगा है नारी होने का त्रास।
कितना लड़ी हूँ कोख में जीवित रहने को,
क्योंकि नहीं है मेरे जीवन का मोल।
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
जब जानना चाहा अपने वजूद को,
तो लाद दिया मेरे ऊपर धरती, सीता-सावित्री का बोझ।
लगी ढूँढ़ने उसमें ही अपना रूप,
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
पढ़ा प्रेम, क्षमा, ममता और त्याग का पाठ,
क्या इसने नहीं ले लिए सीता जी के प्राण?
क्यों नहीं रहने देते औरत को औरत,
होने दो उसको भी अपने अस्तित्व का ज्ञान।
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
जिम्मेदारियों के सिंहासन पर बैठाकर,
लेते हो गुलामी वाला काम।
कितनी चतुराई से तुमने किए टुकड़े
“तुम ही लक्ष्मी घर की, तुम ही अन्नपूर्णा”।
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
बचपन से बुढ़ापे तक की लिस्ट थमा दी हाथ,
अब तू ही बता, औरत कौन-सा कुल चला है तेरे नाम?
मान-मर्यादा, रिश्ते-नाते, धर्म और कर्तव्य निभाना
तुम्हारे लिए मानो गुणों की खान।
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
यदि तुमने की अपने अस्तित्व और सम्मान की बात,
कहा- “मैं औरत ही नहीं, इंसान भी हूँ”,
तभी उखड़ने लगते हैं
समाज की सभ्यता और संस्कार के पाँव।
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
कहाँ तक लड़ूँ अपने को साबित करने के लिए?
मैं औरत बनूँ तो रामायण,
अस्तित्व के लिए लड़ूँ तो महाभारत।
परिवार और समाज को रामायण चाहिए, महाभारत नहीं-
इसलिए,
हाँ, हो गई हूँ मैं स्तब्ध, निशब्द और मौन।
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