मीरा के नाम ख़त

मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा

मीरा!
आज अगर तुम होतीं तो मैं हज़ारों सवाल तुमसे पूछती। युगों पहले तुम्हारा अवतरण हुआ, जब मैं नहीं थी। अब जब मैं तुम्हारे बारे में पढ़ती हूँ और सुनती हूँ, तो न जाने कितने ही प्रश्न मन में उठते हैं।

बताओ मीरा, तुम्हारे अंदर कृष्ण-भक्ति के बीज क्यों और कब अंकुरित हुए? उन्हें कैसे सिंचित किया? कृष्ण को तुमने कभी देखा ही नहीं। जो रूप तुमने देखा, वह तो इंसानों का गढ़ा हुआ है। फिर भी वह तुम्हारे दिल में इस क़दर घर कर गया कि तुमने उसे सर्वस्व मान लिया और उनकी भक्ति में इतनी लीन हुईं कि सारी दुनिया को ठुकराकर दर-दर भटकती रहीं।

महल छोड़ा, पति-मोह छोड़ा, ज़हर पिया ..सब सहती रहीं। सत्संगियों के साथ इधर-उधर घूमती रहीं। पुरुष सत्संगियों के सान्निध्य में रहकर भी किसी के व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं हुईं। तुम ख़ूबसूरत थीं, युवा थीं फिर भी अपने आप को अक्षुण्ण कैसे रखा, मीरा? बताओ।

अब जब तुम्हारे गाए गीत गाती हूँ या सुनती हूँ, तो कितने सवालों के बीच अपने आप को घिरा पाती हूँ। तुम्हारे समकालीन और बाद में न जाने कितनी साध्वियाँ आईं, पर किसी ने इतना प्रभावित नहीं किया जितना तुमने किया।

कौन-सा भरोसा था कि तुमने मान लिया-

“मेरे तो गिरिधर गोपाल,
दूजो न कोय।”

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