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मीरा के नाम ख़त

मीरा के जीवन और भक्ति को याद करते हुए लेखिका अपने भीतर उठते असंख्य प्रश्नों से जूझती है। बिना देखे कृष्ण पर किया गया अटूट विश्वास, सांसारिक सुखों का त्याग और विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को अक्षुण्ण रखना मीरा की भक्ति आज भी मन को विस्मित और प्रेरित करती है।

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राधाष्टमी : राधा-कृष्ण प्रेम की अनंत व्याख्या

भारतीय संस्कृति में प्रेम का सर्वोच्च रूप राधा और कृष्ण के संबंध में मूर्त होता है। राधाष्टमी का पर्व केवल राधा के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उस शाश्वत प्रेम का प्रतीक है, जिसमें आत्मा और परमात्मा का संगम झलकता है। राधा का व्यक्तित्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और आत्मविस्मृति का प्रतीक है। साहित्य में सूरदास, रसखान, बिहारी, जयदेव और नन्ददास जैसे कवियों ने राधा-कृष्ण प्रेम को लौकिक से परे जाकर अध्यात्म से जोड़ा है। राधा का प्रेम मिलन में ही नहीं, बल्कि विरह में भी पूर्ण है। यही निष्काम समर्पण उन्हें भक्ति का शिखर बनाता है। आज के समय में राधा-कृष्ण का प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि अर्पण से जीवित रहता है। राधाष्टमी का संदेश है—प्रेम को भौतिकता से ऊपर उठाकर जीवन को आध्यात्मिक सौंदर्य से भरना।

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तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ.

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