
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
आज जब अपने बच्चों को स्कूल बस तक छोड़कर लौट रही थी, तो अनायास ही मन अतीत में खो गया। मुझे याद आ गए मेरे बचपन और स्कूल के वो सुनहरे दिन।
हम वो पीढ़ी थे, जिन्हें बस या ऑटो तो दूर, साइकिल भी नसीब नहीं होती थी। हमारे लिए ’11 नंबर की बस’ ही सहारा थी – यानी, घर से स्कूल और स्कूल से घर तक का लंबा रास्ता पैदल ही नापा जाता था।
और आज? बच्चों को सोसायटी के गेट तक सुरक्षित पहुँचाना मेरा धर्म बन चुका है। हर पल एक अनजानी चिंता पीछा नहीं छोड़ती कि मेरे बच्चे सुरक्षित तो रहेंगे न। जबकि हमारे माता-पिता हमें स्कूल भेजते समय कभी यह सोचते भी नहीं थे कि कुछ बुरा हो सकता है। कैसा निश्चिंतता का दौर था वह!
कितने मज़े के दिन थे! पास या फेल के अलावा हमारा परसेंटेज से कोई वास्ता नहीं था। मम्मी-पापा को भी सिर्फ पास होने से मतलब था, ताकि अगली क्लास की फीस भरी जा सके। और ट्यूशन? वह तो सिर्फ ‘ढपोर शंख’ बच्चों के लिए थी।
ग्यारहवीं-बारहवीं में भी, अगर बहुत ज़रूरी हुआ तो बस परीक्षा से दो महीने पहले बुक्कीपिंग या अकाउंटेंसी के लिए थोड़ी-सी ट्यूशन लगाने भर के पैसे मिल पाते थे।
उन दिनों किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, और मोरपंख रखकर हम अच्छे अंक प्राप्त करने की योग्यता हासिल करने का विश्वास रखते थे। यह ज्ञान हमें बड़े भाई-बहनों से मिला था, और इसमें हर्ज़ ही क्या था? यह प्रकृति से जुड़ाव ही तो था! स्कूल जाने से पहले, दोस्तों का इंतज़ार करते समय छुई-मुई के पौधे से खेलना कितना रोमांचक होता था!
संयुक्त परिवार में हम सभी बच्चों में बस्ते या फिर एल्युमिनियम की पेटी में अपनी कॉपियों-किताबों को जमा करके रखने की होड़ लगी रहती थी।
जूते को पॉलिश कर-करके चमकाना, और पी.टी. के सफेद कैनवास जूतों को रगड़-रगड़कर छुट्टी के दिन धोना, सिर्फ हमारी अपनी जिम्मेदारी होती थी।
अगली कक्षा की पुरानी, इस्तेमाल की हुई किताबों पर जिल्द चढ़ाने का काम भी अक्सर घर पर ही होता था। माँड (स्टार्च की लाई) बनाकर उसे गोंद की तरह इस्तेमाल किया जाता था। पुरानी किताबों को इस्तेमाल करने में कोई शर्म नहीं आती थी, क्योंकि तब न तो किताबें हर साल बदली जाती थीं और न ही पाठ्यक्रम।
ये सारे काम किताबों पर कवर चढ़ाना, जूतों की देखभाल , यूनीफॉर्म की इस्त्री – हम खुद या बड़े भाई-बहनों के साथ मिलकर करते थे। इसका कोई बोझ माता-पिता पर नहीं पड़ता था।
तब ‘वीकेंड’ जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं था। बस किराए पर साइकिल मिल जाए, तो दोस्त को डंडे पर या कैरियर पर बिठाकर घूमना ही हमारी सबसे बड़ी ‘आउटिंग’ होती थी।
स्कूल में मार खाने पर, मुर्गा बनने पर, या कान मरोड़े जाने पर आज की तरह ‘सेल्फ-एस्टीम’ पर कोई आंच नहीं आती थी। शायद हमें मालूम ही नहीं था कि “आत्म-सम्मान” होता क्या है।
घर पर मार खाना और स्कूल में डांट या सज़ा पाना हमारे दैनिक जीवन का अटूट हिस्सा था। और रोने पर और मार पड़ने का डर तो हमेशा ही बना रहता था।
’चिप्स’ या ‘जंक फूड’ जैसी कोई व्यवस्था अस्तित्व में है, इसकी जानकारी भी नहीं थी। आवश्यकता भी कहाँ थी? थोड़ा-सा चूर्ण या टॉफ़ी भर भी मिल जाए, तो हम खुश थे।
हाँ, गम सिर्फ़ इतना है कि उस समय ‘आई लव यू’ का केवल एक ही मतलब पता था. जो हीरो हीरोइन को बोलता था। हम नहीं जानते थे कि प्रेम में यह बात माँ-बाप को भी बोली जा सकती है। उन्हें यह बताने में शर्म आती थी कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं। पर उस ज़माने में वैसे भी ‘जताना’ इतना ज़रूरी नहीं था।
स्कूल के बाहर वो बेर वाली, चूरन वाली कहाँ खो गई, पता नहीं! टिफिन में आम-नींबू का अचार और पराठे लेकर जाने वाली पीढ़ी अब शायद विलुप्त हो गई है।
आज हमें जो कुछ भी मिला है, उसमें संतोष और आनंद के साथ जीवन जी रहे हैं। और यह सोच ही हमें डिप्रेशन जैसी बीमारियों से दूर रख पा रही है।
हमारा ज़माना अच्छा था या बुरा था, मालूम नहीं, पर वह ज़माना भी क्या ज़माना था!

वाह… बचपन की सारी यादें एक ही लेख में ताज़ा हो गई। Too good…. feeling nostalgic