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टूटे शीशों के बीच खिलता लालबाग

राकेश चंद्रा, प्रसिद्ध लेखक, लखनऊ

लखनऊ विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अध्ययन के दिनों में ही मुझे लखनऊ के अशोक मार्ग पर संचालित दक्षिण भारतीय भाषा विद्यालय में प्रवेश लेने का अवसर मिला। वहाँ मैंने तमिल और मलयालम इन दो दक्षिण भारतीय भाषाओं का क्रमशः चार वर्ष और दो वर्ष तक अध्ययन किया। भाषाएँ केवल शब्दों का संसार नहीं होतीं; वे संस्कृति, व्यवहार और जीवन-दृष्टि की कुंजी भी होती हैं। शायद इसी कारण इन भाषाओं को सीखते हुए मुझे विशेष आनंद की अनुभूति हुई।

इसी विद्यालय के भ्रमण कार्यक्रम के अंतर्गत दक्षिण भारत के चारों राज्यों के सत्रह जनपदों की यात्रा का दुर्लभ अवसर भी मिला। यह यात्रा केवल भूगोल की नहीं थी, बल्कि भाषाई-सांस्कृतिक अनुभवों की एक लंबी शृंखला थी। यात्रा के दौरान दो अनुभव विशेष रूप से स्मृतियों में अंकित हो गए।

पहला अनुभव भाषा-व्यवहार से जुड़ा था। तत्कालीन मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में मैंने देखा कि बहुत-से लोग हिन्दी जानते हुए भी तमिल में ही संवाद करना पसंद करते थे। इसके विपरीत आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में हिन्दी बोलने वाले अपेक्षाकृत अधिक मिले। केरल और कर्नाटक में हिन्दी का प्रयोग बहुत सीमित दिखाई दिया। इस भिन्नता ने मुझे यह समझाया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि अस्मिता का भी प्रश्न होती है।

दूसरा अनुभव अप्रत्याशित और कुछ हद तक विचलित करने वाला था। वर्ष 1978 में यात्रा के अगले पड़ाव पर हम जब प्रातः बंगलौर पहुँचे, तो गाड़ी को स्टेशन पर ही रोकना पड़ा। पूरे स्टेशन परिसर में भारी पथराव के निशान थे टूटे हुए शीशे, बिखरा हुआ मलबा और भय का सन्नाटा। जानकारी मिली कि दिल्ली में इंदिरा गांधी जी की गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा यह प्रदर्शन किया गया था और पूरे शहर में सार्वजनिक यातायात ठप था।

ऐसी स्थिति में हमारे सामने केवल एक ही विकल्प था पैदल ही शहर में प्रवेश कर किसी धर्मशाला या लॉज में आश्रय लेना। सभी साथियों ने अपना-अपना सामान स्वयं उठाया और हम चल पड़े। रास्ते में महात्मा गांधी मार्ग से गुज़रते हुए भव्य शोरूमों और दुकानों के टूटे शीशों ने यह स्पष्ट कर दिया कि विरोध का असर पूरे शहर में फैला हुआ था।

काफी मशक्कत के बाद हम एक धर्मशाला पहुँचे और आवंटित कक्षों में विश्राम किया। अब चिंता यह थी कि दिन कैसे बिताया जाए, क्योंकि बाहर आने-जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी और अगले दिन हमें आगे की यात्रा करनी थी। इसी बीच मैंने पैदल भ्रमण का प्रस्ताव रखा, जिसे थोड़ी हिचक के बाद सभी ने स्वीकार कर लिया।

हमने बंगलौर के प्रसिद्ध लालबाग उद्यान को अपना लक्ष्य बनाया और निकल पड़े। दूरी का वास्तविक अहसास चलते-चलते हुआ। राहगीरों से रास्ता पूछते हुए हम आगे बढ़ते गए। तभी एक सज्जन मिले, जिन्होंने केवल दिशा बताने के बजाय स्वयं हमारे साथ चलकर मार्गदर्शन करना शुरू कर दिया। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे एक बैंक में शाखा प्रबंधक हैं। उनका यह सहज, निस्वार्थ व्यवहार मेरे लिए अत्यंत प्रेरक था। वे हमें लालबाग के प्रवेशद्वार तक छोड़कर गए।

लालबाग उद्यान की हरियाली, विस्तृत परिसर और सजीव सौंदर्य ने दिन भर की थकान को मानो हर लिया। सायंकाल हम अपने ठिकाने पर लौट आए थके हुए, पर संतुष्ट।

अगले दिन हम अपने अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े। इस प्रकार 21 दिनों की यह दक्षिण भारत यात्रा अनुभवों, स्मृतियों और सीखों का एक अमूल्य संग्रह बनकर समाप्त हुई और हम पुनः लखनऊ लौट आए मन में ढेरों दृश्य और जीवन भर साथ रहने वाली यादें लिए।

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