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साइकिल, सपने और मिल रोड

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज पुणे

बस मिडिल स्कूल ही तो खत्म हुआ था. आठवीं पास करके नौवीं में बड़े स्कूल में दाख़िले की तैयारी चल रही थी. उम्र छोटी थी, सपने बड़े और उन सपनों में सबसे बड़ा सपना था साइकिल. उस ज़माने में साइकिल होना कोई साधारण बात नहीं थी. हमारे लिए तो यह किसी लग्ज़री से कम नहीं थी. अब तक महिदपुर रोड से कसारी तक पैदल ही स्कूल जाना होता था. धूप, ठंड, बारिश सब साथ चलते थे. साइकिल चलाने की चाह मन में बहुत पहले से थी, लेकिन जेब इसकी इजाज़त नहीं देती थी. बाज़ार में छोटी साइकिल किराए से मिल जाती थी 25 पैसे घंटा…रमेश दा और सोनीजी साइकिल वाले के यहाँ..पर हमारे हिस्से में तो स्कूल जाते समय मिलने वाले 10-15 पैसे ही आते थे.
उसी में कई बार कमलसिंह बापू के यहाँ केले की उधारी हो जाती थी. बापू भी पूरे हिसाब-किताब वाले आदमी थे.. 25 पैसे से ज़्यादा उधार होते ही मुस्कान के साथ उधारी बंद. यही नियम अहमद ब़र्फवाले (आज के अहमद मिस्त्री) का भी था. 25 पैसे पार और ब़र्फ के गोले बंद… ऐसे में साइकिल किराए पर लेने की हिम्मत कहाँ से आती! कभी-कभार लेते भी, तो आधा समय बार-बार जाकर टाइम पूछने में ही निकल जाता..और जब साइकिल चलाते चलती कम थी, गिरती ज़्यादा. किराए की साइकिल में ज़रा-सी टूट-फूट हो जाए तो रमेश दा तो म़ाफ कर देते थे,लेकिन सोनी साइकिल वाले नानक्या दा? ….वसूली तय थी. इसी डर से साइकिल से दूरी बनी रही. हम तब गार्ड साहब भगवतसिंहजी के यहाँ किराए से रहते थे. पास ही बद्रीदा (बद्रीलाल जी परमार, भूरा/अनिल के पिता) रहा करते थे. वे सुबह-सुबह कपड़ों की गठरी लेकर गाँवों में बेचने निकल जाते और दोपहर तक लौट आते. उनकी एक साइकिल थीएकदम खटारा.
न ब्रेक, न मडगार्ड, न चैनकवर. ताले-सुरक्षा की तो बात ही छोड़िए. वह साइकिल अक्सर नीचे चढ़ाव के पास खड़ी रहती थी. मेरी निगाहें उसी पर टिकी रहती थीं…लेकिन बद्री दा की धमक ऐसी कि सीधे माँगने की हिम्मत कभी नहीं हुई. फिर हमने बचपन का सबसे पुराना हथियार निकाला जुगाड़..जब भी बाबूजी कोई काम बताते, हम बड़े भोलेपन से कहते बद्रीदा से साइकिल दिला दो. बद्री दा बाबूजी के विद्यार्थी रह चुके थे,और गुरु की बात वे कभी टालते नहीं थे.
बस, साइकिल मिल जाती. बाबूजी का नाम लेकर हम साइकिल उठा लाते और मिल रोड पर घंटों चक्कर लगाते. साइकिल चलानी तब तक ठीक से आती नहीं थी. गिरते-पड़ते,पहले कैंची, फिर डंडा, फिर सीट पर बैठना सीखा. फिर बात डबल सवारी से होती हुईतीन सवारी तक जा पहुँची. और फिर आया एडवांस स्टेज..हाथ छोड़कर साइकिल चलाना.
यह स्टेज आज सोचता हूँ तो लगता है,चंद्रयान की स्मूथ लैंडिंग से कम रिस्की नहीं थी. हर पल क्रैश लैंडिंग का खतरा.
कई चक्कर लगाने के बाद..एक दिन हमने भी खुद को काबिल समझ लिया.हाथ छोड़े..और वही हुआ, जिसका डर था.
क्रैश लैंडिंग….पैडल टूटकर अलग हो गया..और डर के मारे मेरे दिमाग़ का सर्किट फ्यूज़. चुपचाप साइकिल उठाई, नीचे चढ़ाव पर खड़ी कर दी.
बद्रीदा दिन में साइकिल नहीं देखते थे. उन्हें ज़रूरत पड़ती थी सुबह करीब छह बजे,जब वे कपड़ों की पोटली लेकर निकलते. उन्होंने देखा..पैडल टूटा हुआ था.फिर बात बाबूजी तक पहुँची.उस दिन के बाद बद्री दा ने कुछ कहा नहीं.
न डाँट, न शिकायत.बस.साइकिल चलाना छूट गया.आज सोचता हूँ..वह स़िर्फ एक साइकिल नहीं थी,वह हमारे बचपन की हिम्मत, शरारत और सपनों की सवारी थी. टूट तो पैडल गया था, पर यादें आज भी साबुत हैं.


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10 thoughts on “साइकिल, सपने और मिल रोड

  1. वो समय ऐसा ही था, छोटे सपने, छोटी उम्मीदें, खुशियां बड़ी बड़ी…..

  2. कई यादें ताज़ा हो गई। मैंने जब साइकिल सीख ली तब गिरी। बहुत बहुत मधूर यादों को साझा करने और मेरा बचपन वापस याद दिला देने के लिए कोटिश धन्यवाद। बहुत सरल, प्रवाहमयी भाषा

  3. यही सच्ची खुशियां थी❤️ आज तो सब मिलकर भी बेमानी लगता है। यादों का सुंदर सफरनामा 👌

    1. यादों की पिटारी से एक और खुशनुमा किस्सा।
      बचपन की वो छोटी छोटी खुशियां ही असली खुशी
      है अभी तो खुशियों का दिखावा है।
      बहुत सुंदर 👌

  4. साइकिल सपने और मिड रोड…अहा!क्या कहने इस आत्मकथ्य के…सहजता और आत्मीयता का सुंदर सामंजस्य।यूं तो सुरेश सर की लेखनी की पहचान ही ‘सहजता’ है लेकिन आज ये रचना मन को गुदगुदा गई…दबी ज़बान से आहिस्ते से बद्री दा की साइकिल के लिए पिता से गुहार लगाना,वो लड़कपन का बेफिक्र अंदाज ,साइकिल चलाने के अलग अलग स्टेज ,अंतिम स्टेज हैंडिल छोड़ कर साइकिल चलाना,चन्द्रयान की स्मूथ लैंडिंग…ये सारे घटनाक्रम मन को गुदगुदा गए और पाठक को बचपन के उस विस्तृत प्रांगण में ले गए जहां विचारों का खुलापन था,प्यार था,आत्मीयता थी,बड़ों का लिहाज़ था और छोटे छोटे सपनों में बेपनाह खुशियां थीं।

  5. बहुत अच्छा लगा पढ़कर! अपना बचपन याद आ गया!

  6. बचपन की अविस्मरणीय स्मृति का सुंदर चित्रण शानदार

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