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रोल नंबर 4740

माँ के अस्पताल के बिस्तर के पास बैठी एक चिंतित बेटी, हाथ में किताब लिए हुए, त्याग और जिम्मेदारी का भावनात्मक दृश्य।

सीमा रॉय

18 दिसंबर 1997…

पापा चले गए। बिना बिस्तर पकड़े। बिना हमें उनकी सेवा का एक भी अवसर दिए।

हम अवाक थे। घर सूना हो गया था, लेकिन जीवन की जंग अभी बाकी थी।

गाँव में पापा की अंत्येष्टि के बाद मैंने अपने छोटे भाई अवनीश कुमार राय से, जो उस समय छठी-सातवीं कक्षा में पढ़ता था, उसकी किताबें और कॉपियाँ माँग लीं। उसे शायद आज यह बात याद भी न हो।

मैं घर के एक कोने में बैठ गई। लगभग 10-12 दिनों में जनरल स्टडीज़ की तैयारी पूरी कर डाली। उस समय घर में हर व्यक्ति हमारे भविष्य को लेकर अपने-अपने अनुमान लगा रहा था। सबसे अधिक चिंतित बड़े भैया दिखाई देते थे, जिन्होंने कभी कोई विशेष जिम्मेदारी नहीं निभाई थी।

सबने लगभग तय कर लिया था कि मैं वीरेंद्र भैया के घर चली जाऊँगी और मेरी छोटी बहन व माँ गाँव लौट जाएँगी।

लेकिन मैंने साफ़ कह दिया—

“हरगिज़ नहीं। जिस गाँव से मेरी माँ टूटी चप्पलों में निकली थीं, वहाँ मैं उन्हें वापस नहीं जाने दूँगी, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।”

लखनऊ लौटी तो पढ़ाई का सिलसिला फिर शुरू हो गया। इतिहास तो मेरी रग-रग में बसा था।

परीक्षा से लगभग एक महीने पहले मेरी मित्र सपना सिंह ने कहा—

“इंदिरा नगर मेरे घर आ जाओ। मम्मी और भाभी सब संभाल लेंगी, हम बस पढ़ाई करेंगे।”

आज सपना कहाँ है, मुझे नहीं पता। काश! कोई उसे यह लेख पढ़ाकर मेरा संदेश पहुँचा दे। उसके पिताजी पुलिस विभाग में किसी बड़े पद पर थे।

माँ की अनुमति लेकर मैं उसके घर चली गई।

एक महीना… केवल किताबें, चाय और सपने।

सपना की माँ और भाभी ने हमारा इतना ध्यान रखा कि हम निश्चिंत होकर पढ़ाई कर सके। हम चौबीस घंटों में मुश्किल से दो-चार घंटे ही सोते थे। बाकी समय केवल पढ़ाई।

फिर वह दिन आया, जिसका इंतज़ार था।

1998 का परिणाम दिवस।

वैद्य कोचिंग के बाहर चयनित अभ्यर्थियों की सूची लगनी थी।

मैंने अपनी मित्र रत्ना लक्ष्मी को फोन किया, जो उस समय भैया के घर रह रही थी।

“प्लीज़, रोल नंबर 4740 देखना।”

लगभग आधे घंटे बाद उसका फोन आया—

“आँख बंद करके मुख्य परीक्षा की तैयारी शुरू कर दो। बधाई हो!”

मुझे लगा वह मज़ाक कर रही है।

मैंने कहा, “सच बता।”

वह बोली—

“तेरी जिंदगी की पहली बड़ी जीत पर मैं झूठ कैसे बोल सकती हूँ?”

घर में माँ और बहन खुशी से झूम उठीं। कॉलोनी के लोगों की नज़रें भी बदल गईं।

नीचे रहने वाले जज साहब की बेटी दौड़ती हुई आई और बोली—

“मुझे तो शुरू से पता था, सीमा ही कुछ अलग करेगी।”

मुख्य परीक्षा की तैयारी शुरू हुई, लेकिन ‘विश्व इतिहास’ मेरे लिए बिल्कुल नया विषय था।

मैंने कोचिंग जॉइन की। पटना से शिक्षक पढ़ाने आते थे। सुबह से शाम तक चार-पाँच कक्षाएँ चलती थीं। मैं उन्हें कैसेट में रिकॉर्ड कर लेती थी।

वहीं मेरी मुलाकात प्रज्ञा सिंह से हुई, जो आज भी मेरी जिगरी दोस्त है। वहीं सुबोध दीक्षित से भी परिचय हुआ… उसकी कहानी फिर कभी।

मैंने मुख्य परीक्षा दी।

दो महीने बाद माँ की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई।

विवेकानंद अस्पताल के डॉक्टर ने उनका हाथ और जीभ देखकर तुरंत कहा—

“इन्हें अभी मेडिकल कॉलेज ले जाइए।”

यह सुनते ही माँ जैसे टूट गईं। उन्होंने कहीं जाने से मना कर दिया।

सबसे पहला फोन मैंने अपने मित्र श्रीमन नारायण शाह को किया। वे चारबाग से शान भाई को लेकर आए। उनके भाई मेडिकल कॉलेज में अध्यक्ष पद पर थे।

माँ गांधी वार्ड में भर्ती हुईं।

उस कठिन समय में मेरा साथ देने के लिए मैं श्रीमन और शान भाई की सदैव ऋणी रहूँगी।

और यहीं से मेरा भविष्य दाँव पर लग गया।

सुबह-शाम किताबें छूट गईं।

अब चिंता थी—दवाइयों की, खाने की, खून की व्यवस्था की।

माँ को हर सप्ताह रक्त चढ़ाना पड़ता था।

जो लड़की एक-दो वर्षों में अधिकारी बन सकती थी, वह माँ के कर्ज़ और सेवा के दायित्व तले दब गई।

माँ लगभग दो-तीन वर्ष तक बिस्तर पर रहीं।

मैं कभी मज़ाक में कह देती—

“मेरी शादी हो जाएगी, तब तुम्हें कौन देखेगा?”

माँ मुस्कुराकर कहतीं—

“पहले डबली की शादी करेंगे, तुम्हारी नहीं। तुम मेरी मृत्यु के बाद ही अपनी शादी करना।”

उनकी बात सुनकर मैं भी मुस्कुरा देती थी।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

7 फरवरी 2000 को माँ ने अंतिम साँस ली।

आज वर्षों बाद कोई नहीं पूछता कि उनकी बेटी ने UPSC जैसी परीक्षा की तैयारी छोड़कर अस्पताल की बेंच क्यों पकड़ी थी।

कोई नहीं कहता—

“सीमा, तुमने अपना करियर दाँव पर लगा दिया।”

जब अपने ही लोग, अपना ही खून, मुझे और मेरी बहन को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो कलेजा छलनी हो जाता है।

मेरे त्याग की चर्चा कहीं नहीं होती।

जिनके लिए मैंने अपने सपने और अरमान कुर्बान कर दिए, वे आज दूसरों की तालियों में मगन हैं।

हाँ, रोल नंबर 4740 पास हो गया था।

लेकिन क्या मैं जिंदगी के इम्तिहान में फेल हो गई?

नहीं।

क्योंकि बेटी होना कोई रोल नंबर नहीं होता।

कोई पद नहीं होता।

यह वह दायित्व है, जिसकी शपथ एक बेटी जीवन भर निभाती है—

बिना किसी प्रमाणपत्र के,

बिना किसी पदक के,

और अक्सर…

बिना किसी वाहवाही के।

2 thoughts on “रोल नंबर 4740

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