सीरत और सूरत

सीरत और सूरत के अंतर को दर्शाती हिंदी कविता, जिसमें चरित्र, संस्कार और आंतरिक सुंदरता की महत्ता का वर्णन किया गया है।

प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तरप्रदेश)

सीरत रही अडिग हिमालय-सी,
सूरत हिम-कणों-सी पिघल गई।
सीरत की रश्मियों की कांति से,
सूरत की चाँदनी कहीं सिमट गई।

सूरत के मानक हैं बहुत संकीर्ण,
सीरत विस्तृत शब्दों में न बँध पाएगी।
व्यक्तित्व के सागर को तलाशते ही,
सूरत ओस, सीरत मोती बन आएगी।

सीरत चरित्र की दीप्ति, आभा और जगमगाहट है,
सूरत क्षणभंगुर, अल्पकालिक, अस्थायी बाज़ार है।
सूरत जल में दिनकर की रश्मियों की छाया है,
सीरत तो स्वयं जल में उतरा हुआ दिनकर है।

सूरत तो ग्रहण-सी कभी भी दागदार हो सकती है,
सीरत संस्कारों का जागता प्रमाण है।
कभी काँच की एक ठोकर से बिखर जाती है सूरत,
वहीं तपे हुए स्वर्ण-सी खरी होती है सीरत।

जिन लोगों को सीरत से ज़्यादा सूरत पर गुमान है,
समय के चक्र में टिकता न सूरत का अभिमान है।
मरकर जो लोग चित्रों में नहीं, दिलों में रह जाते हैं,
वे अपनी खूबसूरती से नहीं, सौम्यता से जगह बनाते हैं।

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