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मुंबई की चॉल की खिड़की के पास किताब पढ़ती महिला, संघर्ष से सफलता की प्रेरक कहानी

पन्नों से परवाज़ तक

लालटेन की रोशनी में शुरू हुआ पढ़ाई का सफर मुंबई की चॉल की छोटी-सी खिड़की तक पहुँचा. जिम्मेदारियों के बीच भी उजाला ने सीखना नहीं छोड़ा और अपने सपनों को हकीकत में बदलकर दूसरों के लिए प्रेरणा बन गई.

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माँ के अस्पताल के बिस्तर के पास बैठी एक चिंतित बेटी, हाथ में किताब लिए हुए, त्याग और जिम्मेदारी का भावनात्मक दृश्य।

रोल नंबर 4740

एक बेटी, जिसने UPSC के सुनहरे सपनों से अधिक अपनी माँ की सेवा को महत्व दिया। पिता के निधन, आर्थिक और पारिवारिक चुनौतियों के बीच संघर्ष, त्याग और जिम्मेदारी की यह कहानी हर पाठक के हृदय को छू जाती है।

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ऑटो चालक पिता के बेटे के कलेक्टर बनने पर भावुक दृश्य, झोपड़ी के सामने भीड़ और गर्व से भरा पिता

अस्तित्व

“अरे काकी, तुम्हें नहीं मालूम क्या? बंसी का बेटा कलेक्टर बन गया है…” संध्या की बात सुनते ही जानकी काकी की आँखों में चमक आ गई। दिन-रात ऑटो चलाकर बेटे को पढ़ाने वाले बंसी की तपस्या आज रंग लाई थी। जब मीडिया ने बेटे से उसकी सफलता का श्रेय पूछा, तो उसने बिना झिझक कहा—“मेरे बाउजी… क्योंकि फल की पहचान हमेशा पेड़ से ही होती है।” यह सुनकर बंसी की आँखों से आँसू बह निकले, और आसपास खड़ी भीड़ तालियों से गूंज उठी। यह सिर्फ एक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष, त्याग और प्रेम का प्रमाण है, जो एक पिता अपने बच्चे के लिए जीता है।

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जिसके सिर पर छांव नहीं थी… वो खुद सूरज बन गया”

फादर्स डे पर बच्चों ने मुझे बधाई दी, लेकिन मैं अपने पिता को कभी ‘हैप्पी फादर्स डे’ नहीं कह पाया। क्योंकि वो होते हुए भी कभी पिता जैसे नहीं रहे। ठोकरें लगीं, खुद ही संभला, खुद ही सीखा… शायद इसी में ज़िंदगी की असली सीख थी।”

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