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गुज़रे ज़माने की बात

प्यार से मिलने मिलाने की निराली बात थी…
उस हसीं गुज़रे ज़माने की निराली बात थी…

एक थाली बैठ खाते, प्यार से सब साथ में,
क्या कहें तब साथ खाने की निराली बात थी…

लोग सच्चे थे ज़बॉं के, बात से फिरते न थे,
वो ग़ज़ब वादा निभाने की निराली बात थी…

एक दूजे के ग़मों को, बांटने का दौर था,
जश्न सब मिलकर मनाने की निराली बात थी…

ये नया क्या दौर ‘परवाना’ न जाने आ गया,
लौट आए फिर पुराने की निराली बात थी…

राकेश कुमार ‘परवाना’, सरदारशहर, चूरू

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