त्यौहार
त्यौहार : खुशी की साझा भाषा
त्यौहार खुशी की साझा भाषा हैं, जो धर्म और परंपराओं से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ते हैं। सोशल मीडिया के दौर में आवश्यकता है कि हम भिन्नताओं का सम्मान करते हुए, एक-दूसरे की खुशियों में सहभागी बनें और “जियो और जीने दो” के सिद्धांत को अपनाएँ।
रूठे पिया
करवा चौथ की तैयारियों के बीच मन में अजीब सी उदासी थी। रवि की नाराज़गी ने त्योहार की सारी चमक जैसे बुझा दी थी। मैंने उनकी पसंद का खाना बनाकर उसमें “सॉरी” का कार्ड छुपा दिया, उम्मीद थी कि वे मुस्कुराएँगे, कॉल करेंगे — पर सन्नाटा ही जवाब बना रहा। शाम ढली तो आँसू ढलक पड़े। तभी दरवाज़े की घंटी बजी — सामने रवि थे, मुस्कराते हुए। बिना कुछ कहे उन्होंने मुझे बाँहों में भर लिया।
त्यौहार
त्यौहार का समय फिर से आया। हल्दी-कुमकुम का त्यौहार आया, सुहागिनों ने श्रृंगार किया, गजरा सजाया, माथे पर बिंदी लगाई, हरि-हरी चूड़ियाँ पहनी, हाथों में मेहंदी लगी और गोटा वाली साड़ियाँ पहनीं। पर उस विधवा ने न तो चमकीली साड़ी पहनी, न ही टीका सजाया, और उसके हाथ भी खाली थे। एक बहन थी, जो पति की सताई हुई थी, वह दरिंदे को छोड़कर घर वापस चली आई। सगुना भी रह गई थी, बिन ब्याही, क्योंकि ग़रीब बाबा उसकी सगाई नहीं कर पाए थे।
उनके हाथों में मेहंदी नहीं थी, पांवों में पायल नहीं थी, चूड़ियों की खनक भी नहीं थी। वह सभी भावों से घायल थीं। उन्हें हल्दी-कुमकुम में जाने की मनाही थी। सब बेरंग, गुमसुम और मुरझाई हुई थीं। वेदना की बूँदें उनकी आँखों में समाई हुई थीं।। सभी को हर त्यौहार पर समान अधिकार मिले। तभी पुरुष प्रधान समाज में भी सभी नारियों का सम्मान होगा और रंग भरी क्यारियाँ सुरभित होंगी।
पुराना बरगद का पेड़
रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?
“कभी तो आओ… फुर्सत के इतवार बनकर”
यह कविता एक गहरी प्रतीक्षा की पुकार है—जहाँ मन किसी के आगमन की राह देख रहा है, जो कभी फुर्सत, कभी मल्हार, कभी रंग और कभी आसुओं की धार बनकर आए। भावनाओं से सजी ये पंक्तियाँ एक ऐसी उपस्थिति की चाहत हैं, जो जीवन को फिर से स्पर्श करे, संगीतमय बनाए और रंगों से भर दे।
