Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

करुणा बन गई कमजोरी

अंधेरे कमरे में खिड़की के पास बैठी एक उदास महिला, आँखों में आँसू और चेहरे पर दर्द की गहरी अभिव्यक्ति, बाहर बारिश का दृश्य

घाव, ग़म और गहराई: बिखरने से संभलने तक

रुचि अग्रवाल सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

हमने इतने घाव सिए हैं,
ना तुम कभी गिन पाओगे।
इतने टुकड़ों में बिखर गए थे,
ना जिन्हें कभी बीन पाओगे।

सिसका था दर्द में पूरा-पूरा,
ज़र्रा-ज़र्रा करहाया था।
खून के आँसू बह निकले थे,
जब ऐसा आलम आया था।

ज़ख्मी की जा रही थी आत्मा,
लेश मात्र करुणा ना थी।
मेरी इस निर्मम हालत की
जिम्मेदार… मेरी भावनाएँ थीं।

बिन सोचे, बिन समझे सब पर
करुणा करना था अपराध।
इस अनचाही आदत के कारण
मैं होती रही हर क्षण बर्बाद।

कितनों ने दिल तोड़ा मेरा,
मेरे… जज़्बातों से खेल गए।
अनंत दर्द देकर मेरे मन को
दुख के सागर में ठेल गए।

ऐसा मेरे ही साथ क्यों होता,
आता था मन में खयाल।
ज़िंदगी सबक सिखा रही थी,
फेंककर अपना माया-जाल।

जब तक सबक न हुआ ये पूरा,
निरंतर मुझे आज़माया गया।
जीवन के इम्तहान में
ना होती करुणा, ना कोई दया।

ऐसा रट्टा मैंने मार लिया अब,
सबक कभी न भूलूँगी।
अपने जज़्बातों की चादर
अब जीवन भर नहीं खोलूँगी।

नहीं मिलेगा कोई आसरा
मेरे… अपनत्व के छत तले।
नहीं पिघलेगा ये मन अब मेरा,
किसी को सिसकते हुए देखूँ भले।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *