
रूचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
जब तुम आओ मिलने कभी,
तो टुकड़ों में न आना,
एक हिस्सा कहीं और छोड़कर
बस दूजा न ले आना।
यूँ आधे-आधे हिस्सों में
पूर्ण समर्पण न होगा,
आधे दर्पण में
अपनत्व का आधा अर्क मिला होगा।
वो अधूरे पन्नों की पुस्तक
तुम मुझको न पढ़ाना,
जब तुम आओ मिलने कभी,
तो पूर्ण रूप में आना।
