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जब तुम आओ…

एक भावुक जोड़ा, अधूरी मुलाकात का प्रतीक, शांत वातावरण में खड़ा हुआ

रूचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्‍चिम बंगाल)

जब तुम आओ मिलने कभी,
तो टुकड़ों में न आना,
एक हिस्सा कहीं और छोड़कर
बस दूजा न ले आना।

यूँ आधे-आधे हिस्सों में
पूर्ण समर्पण न होगा,
आधे दर्पण में
अपनत्व का आधा अर्क मिला होगा।

वो अधूरे पन्नों की पुस्तक
तुम मुझको न पढ़ाना,
जब तुम आओ मिलने कभी,
तो पूर्ण रूप में आना।

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