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'दुनिया कमाल है' शीर्षक वाली सामाजिक सरोकार और इंसानियत पर आधारित हिंदी-उर्दू नज़्म

ब-उनवान: दुनिया

‘दुनिया कमाल है’ एक मार्मिक नज़्म है, जो आज के समाज में बढ़ते झूठ, छल, हिंसा और मानवीय मूल्यों के पतन को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। रचना युद्ध, स्वार्थ और टूटते रिश्तों के बीच प्रेम, भाईचारे और इंसानियत की पुकार बनकर सामने आती है। अंत में कवयित्री एक ऐसे संसार की कल्पना करती हैं, जहाँ शांति, स्नेह और मानवता की खुशबू हर दिशा में फैले। यह नज़्म पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

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राष्ट्रभक्ति और मानवता का संदेश देता हिंदी प्रणय गीत

प्रणय गीत

यह गीत प्रेम की अभिव्यक्ति से पहले राष्ट्र, मानवता और एकता को सर्वोच्च स्थान देता है। समाज में बढ़ती घृणा, विघटन और चुनौतियों के बीच यह रचना प्रेम से अधिक कर्तव्य, समर्पण और राष्ट्रीय चेतना का प्रभावशाली संदेश देती है।

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युद्ध की पृष्ठभूमि में शांति और प्रेम की कामना करती भारतीय स्त्री का भावपूर्ण यथार्थवादी दृश्य, हिंदी कविता का प्रतीकात्मक चित्र।

युद्ध की अरगनी टटोलता स्त्री का प्रेम

युद्ध की भयावहता के बीच एक स्त्री का मन प्रेम, विश्वास और शांति का स्वप्न संजोए रहता है। यह कविता हिंसा के विरुद्ध मानवीय करुणा, सोलह शृंगार की कोमलता और एक नए उजास भरे युग की आकांक्षा को बेहद संवेदनशील ढंग से व्यक्त करती है।

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युद्ध के बाद ध्वस्त शहर में मलबे के बीच खेलते बच्चे और क्षितिज पर उगती आशा की किरण, जो शांति और मानवता का प्रतीक है।

मैं जानता हूँ, फिर भी…

‘मैं जानता हूँ, फिर भी…’ एक विचारोत्तेजक मुक्तछंद कविता है, जो युद्ध की भयावहता, निर्दोष लोगों की पीड़ा, युद्ध-विराम की राहत और मानवता की अमर जिजीविषा को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। यह कविता विनाश के बीच भी उम्मीद और शांति के महत्व को रेखांकित करती है।

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उफनते सागर के किनारे खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति अपनी परछाई को निहारता हुआ, समय, अस्तित्व और जीवन के बदलते किरदारों पर मनन करता हुआ।

किरदार

हम सभी अपने भीतर कई किरदारों को जीते हैं। कुछ समय के साथ खो जाते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं, और कुछ जीवन के संघर्षों के बीच नई पहचान गढ़ते हैं। ‘किरदार’ जीवन, समय, जिजीविषा और आत्म-अस्तित्व की उसी अंतर्द्वंद्वपूर्ण यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है।

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अकेला व्यक्ति अपनी भावनाओं और दर्द के साथ मौन बैठा हुआ, सुनने वाले की तलाश में

‘विलुप्त श्रोता’

‘विलुप्त श्रोता’ एक मार्मिक मुक्तछंद कविता है, जो मनुष्य के भीतर जमा होते दर्द, भावनात्मक थकान और ऐसे समय की विडंबना को उजागर करती है जहाँ सुनने वाले लोग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।

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घर के आँगन में अकेला बैठा वृद्ध पिता, हाथ में बेटी की पुरानी तस्वीर, चेहरे पर दर्द और आँखों में नमी, पृष्ठभूमि में खाली दरवाज़ा और सांझ का धुंधलका।

भागी हुई बेटी का पिता

एक बेटी के घर छोड़ जाने के बाद पिता के मन में उठने वाले अपराधबोध, गुस्से, सामाजिक अपमान और अंततः प्रेम की स्वीकृति का बेहद मार्मिक चित्रण। यह कविता केवल एक पिता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय समाज की जटिल मानसिकता और रिश्तों की गहरी पड़ताल है।

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युवा पीड़ा, सामाजिक निराशा और भीतर के शोर को दर्शाती भावनात्मक हिंदी कविता का दृश्य

पंगु

‘पंगु’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि भीतर दबे शोर, सामाजिक विडंबना, युवा असंतोष और व्यवस्था पर तीखा प्रश्न है। इसमें बेरोजगारी, टूटते सपने, स्त्री असुरक्षा और राजनीतिक वादों के बीच जूझती पीढ़ी की बेचैनी मुखर होकर सामने आती है।

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विभाजित समाज और इंसानियत के संकट को दर्शाता भावनात्मक प्रतीकात्मक दृश्य।

इन्सानियत

‘इन्सानियत’ एक सामाजिक चेतना से भरपूर कविता है, जो अफवाहों, धर्म और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता के बीच मानवता के संकट को तीखे और मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करती है।

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पेड़ की छांव में बैठी महिला स्कूल परिसर में लिख रही है, आसपास खेलते बच्चे और तितलियां हैं, जबकि पृष्ठभूमि में युद्धग्रस्त शहर की धुंधली छवि दिखाई दे रही है।

सत्य

‘सत्य’ एक गहन और विचारोत्तेजक कविता है, जो अमन के बीच युद्ध की भयावहता, बच्चों की मासूमियत और मानव सभ्यता के क्रूर यथार्थ को सामने लाती है। यह कविता शांति, संवेदना और सत्य की खोज का मार्मिक दस्तावेज है।

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