मैं कहीं भी नहीं थी…

मैं कहीं भी नहीं थी: स्त्री अस्तित्व और पहचान पर मार्मिक कविता “एक स्त्री की अनकही आवाज़, जो कहीं दर्ज नहीं थी, पर अस्तित्व में थी।”

मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका

मैं!
उन खेतों की पगडंडियों में नहीं थी,
जहाँ चलते हुए
एक लड़की ने अचानक जाना
कि उसके पैर केवल चलने के लिए नहीं हैं।

मैं!
उन दीवारों में नहीं थी,
जहाँ चूने की परतों के पीछे
किसी ने रातों को दबा रखा था
एक चीख,
जो कभी शब्द नहीं बनी।

मैं!
उन कागज़ों में नहीं थी,
जहाँ औरत को मापा गया था
उसके वस्त्रों, उसकी चुप्पियों
या उसके ‘ना’ कहने की
मजबूरियों से।

मैं!
उन सभाओं में नहीं थी,
जहाँ वाद-विवाद में
मेरी देह को परिभाषित किया गया,
उन्नति की इकाई बनाकर।

मुझे किसी ने ढूँढा नहीं,
क्योंकि मैं कहीं दर्ज नहीं थी
न थाने की रिपोर्ट में,
न अख़बार के कोने में,
न किसी जनकवि के मुक्त छंदों में।

मैं बस एक आवाज़ थी…
जिसे बख्शा नहीं गया।

एक साँस…
जिसे महसूस नहीं किया गया।

एक स्त्री…
जिसे कमरे की केवल एक दीवार समझा गया।

अब मैं
किसी भी दस्तावेज़ में नहीं रहना चाहती—
न देवी बनना,
न प्रतीक।

बस
इतना भर चाहती हूँ…

कि जब कोई लड़की
अपने अंधेरे कोने में सिसकती हो,
तो कोई हो जो कहे—

“तू है…
तू देखी जा रही है…
तेरा होना
बस जीने भर का नहीं,
जीवित रहने का अधिकार भी है।”

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